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बुधवार, 20 अप्रैल 2011

नीबुओं जैसी सनसनाती ताजगी


हम- तुम मिलते थे
दूसरों की नज़रों से बचते -बचाते
कभी झाड़ियों में
कभी खंडहरों के एकांत में
सबकी नज़रों में खटकते थे
फिर एक दिन ...
घर से भाग गए थे
बिना सोचे-समझे
अपनी दुनियाँ बसाने //

नीबुओं जैसी सनसनाती ताजगी
देती थी तेरी हर अदा
कितना अच्छा लगता था
दो समतल दर्पण के बीच
तुम्हारा फोटो रख
अनंत प्रतिबिम्ब देखना
मानो ...
तुम ज़र्रे-ज़र्रे में समाहित हो //

कहने को
हम अब भी
एक-दूजे पे मरते है
एक-दुसरे के साँसों में बसते हैं
एक-दूजे के बिना आहें भरते है
मगर ....
दिल के खिलौने को
हम रोज तोड़ते हैं
क्योकि हम प्यार करते है //

16 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही प्यारी पर मन को अतित और बर्तमान से रुबरु कराती आपकी बहुत ही सुन्दर कविता ! बधाई के लिए शब्द नहिं !

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  2. एक और सुन्दर कविता आपकी कलम से !

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  3. नीबुओं जैसी सनसनाती ताजगी
    देती थी तेरी हर अदा
    कितना अच्छा लगता था
    दो समतल दर्पण के बीच
    तुम्हारा फोटो रख
    अनंत प्रतिबिम्ब देखना

    aisa kya...
    bade khubsurat shabd peeroye aapne:)

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  4. व्यस्तता के कारण देर से आने के लिए माफ़ी चाहता हूँ.

    आप मेरे ब्लॉग पे पधारे इस के लिए बहुत बहुत धन्यवाद् और आशा करता हु आप मुझे इसी तरह प्रोत्सन करते रहेगे
    दिनेश पारीक

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  5. बबन भाई.... बेहद खूबसूरत.... दो समतल दर्पण के बीच तेरी तस्वीर रखना.... और साथ ही..... दिल के खिलौने को हम रोज तोड़ते हैं क्योंकि हम प्यार करते हैं..... बेहतरीन....

    आकर्षण

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  6. Very Nice ..plz visit My blog= http://yogeshamana.blogspot.com/

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  7. एक-दूजे पे मरते है
    एक-दुसरे के साँसों में बसते हैं
    एक-दूजे के बिना आहें भरते है
    मगर ....
    दिल के खिलौने को
    हम रोज तोड़ते हैं
    theses lines are also great sir

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