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मंगलवार, 15 मई 2012

पहचान

एक औरत है 
जिसके 
हाथों की अकडन 
घुटनों का दर्द 
और चहरे की झुरिय्याँ 
 बढ़ जाती है , साल-दर-साल 
समतल जमीन पर 
उसके चलने का ढंग 
मानो पहाड़ चढ़ती महिला 
एक लाठी के संग //

पहचाना आपने 
वह मेरी माँ है //

12 टिप्‍पणियां:

  1. bahut bahut bahut acha hai... shabd kam hai iske liye

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  2. behtreen prastuti ............ koi shabdh nahi ..... lajawaab ....

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  3. क्या बात है...अब माँ को सहारे की ज़रूरत है...

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  4. क्या कहने, बहुत सुंदर
    आपको पढना वाकई सुखद अनुभव है।

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  5. पहचाना आपने
    वह मेरी माँ है //
    NOT MORE THAN THIS .ENOUGH AND ENOUGH.
    MY MOTHER

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  6. माँ को मेरा शत - शत नमन ..!!
    खुबसूरत रचना आपकी बड़े भाई ....बधाई स्वीकारें ....!!

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  7. बहुत सुंदर कविता .....बधाई
    कभी समय मिले तो तो shiva12877.blogspot.in पर भी पधारें ..

    जवाब देंहटाएं
  8. बहुत ही बेहतरीन और प्रशंसनीय प्रस्तुति....


    इंडिया दर्पण
    की ओर से आभार।

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