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रविवार, 2 फ़रवरी 2014

आग से

तुम कितने डरपोक हो आग
घर भी जलाते हो तो गरीबों का //

देखो तो ..
तुम्हारे सात फेरे लेकर
किये गए वादे
टूट रही है भरभराकर

तुम गला देते हो .
लोहे और अलमुनियम
बना देते ही ईट
कच्ची मिटटी से
तुम कब जला पाओगे
आदमी  के लोभ/लालच/काम/क्रोध
मगर !
और धन लोलुप्ता
तुम्हारा कमाल एक ही बार दिखा है ..
जब प्रह्लाद को न जलाकर
,तुमने जला दिया था होलिका को //

7 टिप्‍पणियां:

  1. उत्तर
    1. बहुत-बहुत शुक्रिया @ जोशी भाई

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  2. अंतिम पंक्तियों पर कुछ कहना चाहती है
    आप को और पूरे परिवार को बसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएं...!!

    @ संजय भास्कर

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  3. बहुत सुंदर प्रस्तुति...!
    बसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएं..
    RECENT POST-: बसंत ने अभी रूप संवारा नहीं है

    उत्तर देंहटाएं
  4. शानदार प्रस्तुति, अच्छी कविता से साक्षात्कार हुआ । मेरे नए पोस्ट "सपनों की भी उम्र होती है "पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है।

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