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रविवार, 8 जून 2014

मन

मन
बुनता है जाल
रोकता है रास्ता
इंसान को फंस कर गिरता देख
हँसता है मन //

पता  नहीं कब...
मन बना लेता है
घोटाले का प्लान
अपहरण की साजिश
और कर बैठता  है
दुष्कर्म /बलात्कार और हत्या //

सच में ...
जलेबी की तरह है
मन की बनावट

7 टिप्‍पणियां:

  1. गहरा कटाक्ष ... तरस आता है कुछ लोगों की सोच पर ...

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    1. हौसला आफज़ाई के लिए आपका आभार

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  2. बहुत खूब...इस बार दर्शन सुख से वंचित कर दिया...

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  3. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  4. सच कहा आपने की जलेबी की तरह ही है....मन की बनावट ....

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  5. सही कहा। मन की बनावट बिल्‍कुल जलेबी की तरह है।

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