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बुधवार, 29 जनवरी 2014

नेता और बसंत



हर फल चखते नेता
हर गंध सूंघते नेता
जनता को समझते
धोबी का गदहा , नेता //

हर जीत उनका बसंत
हर हार ,उनका पतझड़
आंदोलन है ,उनका डिग्री
चक्का जाम है, उनको भाता//

गठबंधन की नाव चलाते
बात-बात पर चुटकी लेते
बैठक में सबकी  सुनते
विश्व्वास मत से, उनको फायदा //   

5 टिप्‍पणियां:

  1. वाह !
    गजब का होता है नेता
    पहले राजनीति तक ही
    था बस सीमित सीमित
    अब तो घर घर में होता है नेता :)

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  2. जात न पूछो संतों की...अरे...नेता की...

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  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज सोमवार (10-03-2014) को आज की अभिव्यक्ति; चर्चा मंच 1547 पर भी है!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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