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शनिवार, 12 नवंबर 2011

मच्छड़


कटीले मच्छड़ , नशीले मच्छड़
क्यों नहीं मरते ये आजकल
चाहे कितना मरो थप्पड़ //

चलते फिरते या बैठे-बैठे
भाषण का ये डंक मारते
अन्धकार की बात निराली
उजाले से भी ,ये नहीं डरते
इनके जैसा न कोई गप्क्कड़
मोटे मच्छड़, पतले मच्छड़//

नहीं डरता इन्हें रसायन
मिल जाते ये हर वातायन
हाथ हिलाते बढ़ते जाते
और सुनते अपना गायन
इनके जैसा न कोई भुलक्कड़ //
गोरे मच्छड़, काले मच्छड़....

8 टिप्‍पणियां:

  1. ha ha ha ,
    nadan nahi hain ham sab jante hai ki
    apke fenke khanjar kidhar jate hain..
    bahut badhiya likha hai..
    jai hind jai bharat

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  2. मच्छर के ऊपर बहुत सुंदर रचना..बधाई....
    मेरी नई पोस्ट स्वागत है

    उत्तर देंहटाएं
  3. मच्छरों के बहाने आपने बहुत बढ़िया कमेन्ट किया है सर जी ...बहुत खूब ..
    डॉ. रत्नेश त्रिपाठी

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