followers

रविवार, 18 मार्च 2012

कुछ तो बोलो गोरी


उर का संगम पाकर
मस्त हुई तेरी ओढ़नियाँ
मेरा आलिंगन पाकर
बज उती तेरी पैजनियाँ //

तेरी आँखों में लगकर
मस्त हुआ ये काजल
उड़ता गेसू देख तुम्हारा
मस्त हुआ ये बादल //

तेरे माथे में सजकर
मस्त हुआ ये कुमकुम
कुछ तो बोलो गोरी
क्यों बैठी हो गुम-शुम //

तेरे कानों को चूमकर
मस्त हुई ये बाली
अपना लो प्रीतम मुझको
कर दुगां तेरी रखवाली //

18 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुंदर रचना,......

    तेरी आँखों में लगकर
    मस्त हुआ ये काजल
    उड़ता गेसू देख तुम्हारा
    मस्त हुआ ये बादल //

    MY RESENT POST... फुहार....: रिश्वत लिए वगैर....

    उत्तर देंहटाएं
  2. अइसन बुझाता के होरी के मस्ती अबहियों बड़ले बा | हई फोटोवा कहवाँ से कबड़ले बाड़ हो मरदे !

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...
    आपके इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा कल दिनांक 19-03-2012 को सोमवारीय चर्चामंच पर भी होगी। सूचनार्थ

    उत्तर देंहटाएं
  4. तेरे कानों को चूमकर
    मस्त हुई ये बाली
    अपना लो प्रीतम मुझको
    कर दुगां तेरी रखवाली //
    GREAT LINES SIR JEE

    उत्तर देंहटाएं
  5. श्रृंगार को नए आयाम देती रचना .

    उत्तर देंहटाएं
  6. " हा हुसैन हम न हुए" ;))) बहुत खूब बब्बन जी :)

    उत्तर देंहटाएं
  7. रचना अच्छी है,
    पर छायाकृति का चुनाव बिल्कुल ग़लत;
    ना तो ओढ़नियाँ है और न ही पैजनियाँ.
    ना तो कुमकुम, न ये गुम-शुम.

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. आपकी शिकायत सही है

      हटाएं
    2. दयानंद पांडेय जी का नोवेल " लोक कवि अब गाते नहीं" पढ़ा कुछ दिन पहले

      उसमे लोक कवि जो पहले बिरहा गाते थे, बाद में आरकेस्ट्रा ग्रूप बना लेते है, जिसमें लड़किया नाचती हैं. तो लोग लड़कियों का नाच देखने आने लगे पैसा भी बहुत आने लगा, पर लोगों को लोक कवि का बिरहा नहीं अब लड़कियों का नाच अच्छा लगने लगा था.
      कहीं ऐसा ना हो की यहाँ लोग कविता कम पढ़ें फोटो ज़्यादे देखे, कविता के साथ अन्याय होगा आपका.

      हटाएं
    3. दयानंद पांडेय जी का नोवेल "लोक कवि अब गाते नहीं" पढ़ा कुछ दिन पहले
      http://sarokarnama.blogspot.in/2012/02/blog-post_09.html

      उसमे लोक कवि बिरहा गायक हैं. जो बिरहा गाते गाते आरकेस्ट्रा ग्रूप चलाने लगते है. और लड़किया नाचने लगती है, उनके ग्रूप मे और वो गाते हैं. बाद में लोग लड़कियों का नाच देखने आने लगे उनका बिरहा तो सुनने कौन ही आता.
      तो कहीं ऐसा न हो की लोग लड़कियों की फोटो देखे कविता किनारे हो जाए.
      ये कविता के साथ अन्याय होगा.

      हटाएं
  8. आपके दो ब्लॉग की कई कवितायें पढ़ीं। मस्ती के साथ-साथ गंभीर और बेहतरीन कविताएं भी हैं। चित्र ऐसे लगाते हैं मानो चित्र देख कर ही कविता लिखते हों। आपको पढ़ना अच्छा रहा..।

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. भाई देवेन्द्र जी ... आपका बहुत -बहुत आभार

      हटाएं
    2. देवेन्द्र पाण्डेय जी मुझे लगता है या तो आपने फोटो अच्छे से नहीं देखा, या फिर कविता नहीं पढ़ी, और मैं ये क्यों कह रहा हूँ ये आप उपर मेरा कॉमेंट पढ़ कर समझ जाएँगे.
      अब तो यहाँ उदाहरण भी है बब्बन भैया.

      हटाएं
  9. सौंदर्य से आभूषण की गरिमा का बढ़ जाने की कल्पना एक'सुन्दरम' का अध्यात्म दर्शन है |
    सराहनीय !साधुवाद!

    उत्तर देंहटाएं

मेरे बारे में