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रविवार, 10 नवंबर 2013

दर्द

दर्द की शुरुयात
पेट दर्द से हुई थी
आँख.नाक,कान होते हुए यह दर्द
पुरे बदन में फ़ैल गया था //

ज़वानी में कदम रखा ही था  कि
भाई-बंधुओं के बीच
बना स्नेह-सौहार्द का महल टूटने लगा...
पहली बार अनुभव हुआ..
रिश्तों के टूटने का दर्द

बेरहम आफिस के कर्मचारियों ने
दौड़ाते-दौड़ाते न जाने कितने दर्द दिए

फिर साथ पढ़ने -वाली पर दिल आया
पता नहीं दिल कैसा होता है
टूट कर आवाज तो नहीं करता
पर दे जाता है
एक लाईलाज  दर्द //

8 टिप्‍पणियां:

  1. दर्द ही तो लेखन का सबब बन जाता है...

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  2. बहुत खूब लिखा आपने .......

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    1. आभार और शुक्रिया @ रत्नेश त्रिपाठी जी उर्फ़ आर्य जी

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  3. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि की चर्चा कल मंगल वार १२ /११/१३ को चर्चामंच पर राजेशकुमारी द्वारा की जायेगी आपका वहाँ हार्दिक स्वागत है

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  4. इसी बहाने कलम तो चल जाती है. अति सुन्दर.

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  5. इस लाइलाज दर्द का कोई इलाज नहीं होता ...
    गहरी बातें सहज ही लिख दीं ...

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