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सोमवार, 11 नवंबर 2013

महताब को रोना आये

आलोकित हो पथ
जब पग बढे तुम्हारा
प्रचोदित हो जलद
जब अधर हिले तुम्हारा//

महताब को रोना आये
जब घूँघट उड़े तुम्हारा
सिंधु गरजे  बार-बार
जब हिले मेखला तेरा //

प्रचोदित .. आवेशित //माहताब -- चाँद 

7 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुंदर ..लिखते रहिये

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  2. क्या बात है, कविता में सौंदर्य की पराकाष्ठा। .

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  3. सुन्दर रचना
    यहाँ भी पधारें
    http://iwillrocknow.blogspot.in/

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