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सोमवार, 23 सितंबर 2013

ये राजनितिक पार्टी की जुलूस है

राजभवन/ राष्ट्रपति  भवन को कूच करता
यह जुलुस
आम आदमी का नहीं हो सकता //

ख़ास बात है
इस जुलूस में
बैनर बदले है
मांगे बदली है
मगर !
बैनर पकड़ने वालों का चेहरा एक ही है //

माइक पर जो व्यक्ति कल
सरकार की नीतियों का बखिया उधेड़ रहा था
आज वही शख्श ...
सरकार की उन्ही नीतियों पर
गंगा -जल डाल रहा है //
जाने दीजिये ...
इस जुलूस  को
ये राजनितिक पार्टी की जुलूस है //

शनिवार, 21 सितंबर 2013

बस य़ू ही ...

रुपयों की तंगी से कितने तंग सो जाते है लोग
खुली सड़क बिना बिछावन य़ू ही सो जाते है लोग //

पग-पग पर हालातों से समझौता करते हैं लोग
दोस्ती दिखाने को बस य़ू ही मुस्कुराते हैं लोग //

बातों को काटते-काटते , सर काट देते हैं लोग
जिंदगी बस यु ही,लड़ते-झगड़ते बिताते है लोग //


पहले  मुसीबतों में खुलकर मदद को आते थे लोग
अब  माँ-बहनों को देख,य़ू ही लंगोटा खोल देते है लोग //


मंगलवार, 20 अगस्त 2013

!! मेरे बच्चे !!

अजीबोगरीब है ...
मेरे बच्चो के शगल
मकई के बालों का मुछं बना
डराते हैं अपनी माँ को //
दौड़ पड़ते है ..
रंग-बिरंगी तितलियों के पीछे
नहर में छलांग लगा देते है
नहाने के वक़्त
और हाथों से घोंघा निकाल लेते है//

आश्चर्य होता है मुझे
जब ये कन्धा देते है
मुहर्रम के ताजिये को
और बड़े उनके रास्तों को रोकते है //

इनके दोस्त ...
फरहान और अख्तर भी
तन-मन से करते है
छठ घात की सफाई //

जब फसं जाता है ट्रेक्टर खेतों में
उसे निकालने दौड़ पड़ते है ...
अरे भाई ... !
शहर में नहीं,
गाँव में रहते है मेरे बच्चे //

रविवार, 28 जुलाई 2013

क्यों करेगी दोस्ती, नदी हमसे

गज़ब संयोग है
आदमी और नदी का ....
नदी जब प्रसन्न  होती है
आदमी निराश होने लगता है ...
क्या पता...
क्या होगा ....
घर बहा ले जायेगी
या फिर खेत
नदी हमसे मुहब्बत नहीं करती
क्योकि बना ली हमने
अपने घर ... उसके रास्ते में
नदी को बाँध दिया है हमने
नदी के जीवों को
मार दिया हमने
क्यों करेगी दोस्ती, नदी हमसे

शुक्रवार, 19 जुलाई 2013

प्यार की गोली (हसिकाएं)

(१)
मैं तुम्हें पसंद
तुम मुझे
खयालात दोनों के
अब मिलने लगे गले
अरे ! हटो ..
मुझे  तो इश्क होने लगा

(२)
लव की पोटली से
एक गोली खाकर
वह लगा डकरने
आओ ! सनम
नहीं तो , मैं चला मरने ...

मीठा पुलाव और सोया बरी

कल तक माँ
घर के
मिटटी के चूल्हे
बुझा देती थी पानी के छींटे मारकर
आज ये खुद भुझ गए  है
माँ की  अविरल आंसुओं से //

दादा के कन्धों पर चढ़कर
दहाड़ मारता था जो पोता
वह कन्धा अब टूट चूका है
"मेरी लाठी था रे तू !
क्यों टूट गया "
चीख रहा है दादा

बच्चे कहते है
बेहतर है
माँ की सुखी रोटी और प्याज
मीठे पुलाव और सोया-बरी की सब्जी से //
( बिकार के छपरा जिले में १६-७-१३ को मिड दे मिल
खाने से २४ बच्चो की मृतुयु के बाद लिखी गयी पोस्ट )

सोमवार, 8 जुलाई 2013

मुनादी ..

नाबालिक बच्ची है
उम्र कोई १५ साल
जींस और टॉप पहने
रंग गोरी ,चेहरा गोल है
बाल कंधे तक
बांगला खूब बोलती है
हिंदी/इंग्लिश समझती है
लापता है ...

अरे ! काम की बात बताना
भूल ही गया
नाचती और गाती है
ओर्केस्ट्रा में काम करती है ...
कैसे भेज देती है एक माँ
उसे बिहार .... मात्र एक कागज पर
ले जानेवाले से दस्खत करा कर //

उसे क्या पता था
ओर्केस्ट्रा वाला धकेल देगा
किसी गैर मर्द के साथ ,सोने के लिए
खैर ... किसी तरह भाग निकली है
तब से लापता है ..

आपके पास कोई
नाबालिक बच्ची तो नहीं लाई गयी...

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