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रविवार, 26 जून 2011

जब भींगी तेरी ओढ़नी


बादल देख झूमा उपवन
झूम रहे मोर -मोरनी
और ज़वां लगने लगी तुम
जब भींगी तेरी ओढ़नी //

भर गए सारे ताल-तलैया
मेढकी गाने लगी रागिनी
आने लगी महक यौवन की
जब नभ में छाई चांदनी //

काले का भ्रम फैलाती
काली लम्बी तेरी मेखला
तेरी अँखियाँ जिधर कौंधती
बरस पड़ती उधर दामिनी //

5 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर रस रंग बबन पाण्डेय जी बारिश का क्या आनंद दिलाया
    -मदमस्त -पर भीगी तेरी ओढ़नी की जगह
    शायद उड़ गयी इसकी ओढ़नी

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  2. ओढनी भीग जाने के बाद सौन्दर्य में और निखार आजाना श्रंगार रस का एक उम्दा उदाहरण है। नजर कि लिये कौधना , उसकी उपमा चांदनी से देना और सबसे बढिया बात यह कि चित्र के अनुरुप रचना । बहुत प्यारी और मौसम के अनुरुप कविता ।

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  3. बहुत ही खूबसूरत भावाभिव्यक्ति...

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  4. तेरी अंखियां जिधर कौंधतीं, बरह पड़ती उधर दामनी।

    बेहतरीन।

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