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बुधवार, 22 जून 2011

बीज का आत्मकथ्य


पिताजी ! मैं एक
छोटा सा ही सही
वृक्ष बन गया हूँ
उस बीज से
जिसे आपने रोपा था
मेरी माँ के कोख में //

बन सकता था मैं
एक विशाल वृक्ष
कसैले पानी पी-पीकर
मगर ! पिताजी
मेरे सारथी तो आप थे //

यकीन मानिए
मुझमे कसैले फल नहीं
आपने आम रोपा था न
मैं बबूल कैसे होता
मैं उऋण नहीं हो सकता //

5 टिप्‍पणियां:

  1. वाह .जी .....बिज आपने संस्कारों का फल देता ही है .....अब चाहे उसको कसेला पानी ही क्यू नहीं मिला हो ज़माने द्वारा या आपने घर के द्वारा ..पर अपने फल के प्रति हमेंशन कृतज्ञ रहता है ....प्रकृति का नियम है ....अब इन्सान कई बार सोचता है की मैने तो पानी और आपने सारथि होने का सही कर्त्तव्य निभाया है पर ....खेर .फल का शुद्ध होना जरुरी आज के इन्सान का ....बिज वाही फल देगा .. भ्रम में आज का इन्सान कई जगह ....सुंदर बबन जी nirmal Paneri

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  2. आपने आम रोपा था न
    मैं बबूल कैसे होता
    मैं उऋण नहीं हो सकता //

    गहन अनुभूतियों की सुन्दर अभिव्यक्ति ...
    हार्दिक बधाई.

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  3. ।मैं उरिण नहीं हो सकत॥ बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति।

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  4. आपने आम रोपा था न
    मैं बबूल कैसे होता
    मैं उऋण नहीं हो सकता //

    अनुभूतियों की सुन्दर अभिव्यक्ति ...
    लाजवाब रचना ........

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  5. मुझमे कसैले फल नहीं
    आपने आम रोपा था न
    मैं बबूल कैसे होता
    मैं उऋण नहीं हो सकता SACH KAHA AAPNE JAISE SASKAAR MILATEN HAI INSAAN WAISA HI BANATAA HAI.SAARTHAK RACHANAA.BADHAAI AAPKO.MERE BLOG MAIN AANE KE LIYE BAHUT BAHUT DHANYAWAAD,AASHA HAI AAGE BHI AAP MERI RACHANAON PER APNE COMMENTS DETE RAHENGE.AABHAAR

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