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रविवार, 30 मई 2010

नदी तट पर बैठी एक औरत


नदी तट पर बैठी थी
वह औरत .....
रोज देखती थी ...

उसमे गिरते गंदे नालों को
उसे लगता
मैं भी इसी गन्दी नदी की तरह हू

मानव व्यापार करने वालों ने
धकेल दिया मुझे .....
अँधेरी गलियो में
मैं भी नदी की तरह
कितनों से समागम कर
ढ़ोती हू ...उनकी गंदगी

फिर कुछ दिन बाद
एक बाढ़ आयी ....
नदी साफ़ हो गयी

तट पर बैठी औरत सोच रही थी
क्या मेरी जिन्दगी में भी कभी
इसी तरह कोई बाढ़ आएगी ?

15 टिप्‍पणियां:

  1. bahut aacha likha hai .. bhagwan kare jis jis ko is baadha kee jaroorat hai use mile wo

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  2. babanji,gandgi hamare dimaag mein hoti hai....wo aurat to mazboori ke kaaran aisa karne par vivash thii, asli gandgi to un bhediyon ki hai jinhone manav ka roop le kar naari shoshan ko apna adhikaar bana liya hai.baadh aane se kya hoga?? uske mann mein jo zahar ghoola hai wo kaise saaf hoga??

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  3. बहुत ही सहि लिखा है आपने वो दिन कभी नहि आऐगा भ्राता श्री..इस पुरुष प्रधान समाज मे नारी सदा से भोग बिलास का सामान मात्र रही है. अब तो फिर भी कुछ समय परिवर्तन हो रहा है वरना अगर हम इतिहास के पन्नों को देखे तो पाते है कि उस समय तो कई कई पत्नियाँ रखने का रिवाज था. ईस समय जिसको हमने " अंधेरी गलियों " का
    नाम दिया है सायद उस समय लोग इसको " सितारों वाली गली " कहते होंगे !

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  4. Baban ji gandi hamari mansikta hai, yeh to vo asahay aur nirbal ma betia hai, jinhe hamare samaj ke kuch logo ne is gart me dhakel diya hai, aur yeh Ganga ki tarah sabki gandagi apne ander samaye anavarat bahne ko vivas hai, agar yeh na ho to aise logo ke hatho hamari ma betia bhi surakshit na rahe, yeh unko bhi nigal jaaye apni bhookhi aankhon se, aur agar koi abla is gart se nikalna chahti hai, to sabse pahle ham hi usper ungli uthate hai, use apnane se inkaar ker dete hai, aur vo vivash ho jaati hai, phir usi gart me girne ko, lautne ko phir usi narak me.....

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  5. तट पर बैठी औरत सोच रही थी
    क्या मेरी जिन्दगी में भी कभी
    इसी तरह कोई बाढ़ आएगी ?
    vedna ubhar aayi hai in panktiyon mein...
    iswar kare traan paye har trasht ikayi!!!

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  6. Bhai Ji, aap ne bahut hi acha likha hi...aap ka ye lekh kabile tarif hai...Parivartan prakriti ka niyam hai...kash...hamara samaj bhi parivartit ho jai...aur ham AURAT ko "DEVI" ke rup me dekhe...samaj me bahut bada badalav ki jarur hai...mai samajhta hu ki aap ka ye lekh samaj ko badalane me bahut bada sahayog karega...aap ko dhanyavaad jo aap ne Samaj ko jagrit karane wala lekh ham sabhi tak pahuchaye..

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  7. बबनजी,
    अभी तो ताजा ताजा घटना है... देश के सर्वोच्च न्यायालय ने एकबार फिर "रखैल" को परिभाषित किया है... जिसका एक महिला वकील ने अगले दिन पुरजोर विरोध किया...
    शर्म की बात तो यह है कि अवैध देह व्यापार इस देश में दिन रात पनप रहा है क्योंकि कानून इस बारे में कम-जोर है एवं कानून एवं समाज के ठेकेदार इस बारे में आँखें मूँद के कुम्भकरण की नींद सोये हैं...
    देश के एक जाने-माने अखबार ने विगत १९ अक्टूबर को जो खबर प्रकाशित की है उसे पढ़ने के बाद कोई भी व्यक्ति शायद अपने आप को इस "सभ्य-समाज" का हिस्सा होने का दंभ नहीं भर सकेगा...
    http://timesofindia.indiatimes.com/city/kolkata-/Streetkids-in-grip-of-STDs/articleshow/6771541.cms

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  8. बबन जी............बहुत अच्छा विषय उठाया आपने........जितने पुराने इंसान इस दुनिया में उतना ही पुराना यह देह- व्यवसाय...........या स्त्री शोषण.....और ऐसा भी नहीं कि यह औरात सिर्फ हमारे देश की है.......यह कही की भी हो सकती है........किसी भी विकसित देश की.......किसी भी विकासशील देश की या फिर किसी भी गरीब देश की......तरीके अलग हो जाते हैं.........पर बात वही.....जो चीज आसानी से हो सके .....उसका क्यों ना फायदा उठाया जाये.........और यही सोच अभी तक नहीं बदली हैं इस पुरुष प्रधान समाज की......औरत पढ़ती जा रही हैं...आवाज उठा रही हैं.....पर अब तरीके भी बदलते जा रहे हैं........तो पुरुष कि सोच में जब तक बदलाव नहीं आएगा यह ऐसे ही चलता रहेगा.....

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  9. बबनजी..इस विषय पर कलम पंक्तिबध करने के लिये साधुवाद..यह कर्म सदियों से होता आया है....मधुसुदनजी ने भी एक सटीक बात कही है..’देश के कनूनविद जो न्यायालय की शोभा बढा रहे है..इसी मांनसिकता से ग्रसित हैं..नारी का न्याय कहां है..हम सब चिंता कर सकते हैं समाधान नहीं कर सकते क्योंकि कानून अंधा और ईसी मानसिकता से ग्रस्त है...

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  10. बहुत सुंदर, बहुत ही भावपूर्ण रचना... हार्दिक बधाई!

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  11. बहुत गंभीर मुद्दा उठाया है आपने बबन भाई. जाने कब आएगी ऐसी बाढ़ जो समाज की हर गंदगी को बहा ले जायेगी.

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  12. भाई जी
    बहुत ही सुन्दर, भावुकता से परिपूर्ण, मार्मिक रचना.....लेकिन एक सत्य है आज से नहीं वरन इतिहास के साक्ष्य से ही हम ने हमारे समाज ने औरत को भोग की वास्तु ही बना रखा है.... लेकिन सच ही एक इंतजार कभी ख़तम नहीं होती की आखिर वो निर्मल सुबह कब आएगी.......जब नदी के समान औरत की लाज बचाने वाला बाढ़ कब आएगा..........

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  13. आदरणीय बबन सर, देह व्यापार में लगी स्त्रियों की यथार्थ करुन गाथा व्यक्त की है आपने अपनी रचना में..देह व्यापार में लगी स्त्री के आँगन की माटी से माँ दुर्गा की प्रतिमा का निर्माण होता है अतः इस वेश्या के कर्ज़दार हमारे स्त्रीदेह ग्राहक समाज के लोगों को अपने क्रिया-कलापों का हिसाब इसी मृत्युलोक में देना होगा..देवी शक्ति रूप में विश्व के प्राचीनतम व्यापार को चलाने वाली इस वेश्या रुपी माँ- शक्ति को मेरा नमन..ॐ जय माँ

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  14. aapne bahut hi sunder tarike se rchna taiyar ki hai ye to such hai ki hum apne liye sochte hai kewal unke bare me nhi humara manna hai sir agar sarkar un ladieso ko kpo project de yani kaam ka rasta de to shayad ye unka dhandha band ho jye

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