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मंगलवार, 8 फ़रवरी 2011

रैंगिंग -2

हालांकि ऐसा करने में मुझे कोई संकोच नहीं हो रहा था परन्तु अनजान जगह मैं सूर्यास्त से पहले पहुँच जाना चाहता था ,इसलिए खीझ आ रही थी /मैं अपना परिचय मेढक की तरह उछल -उछल कर दे रहा था /कोई २० बीस मिनट हुए होंगें करीब ५० लोगों का घेरा बन चूका था /एक दबाव मेरे ऊपर बढ़ता जा रहा था ,लग रहा था मानो भीड़ को चिर कर भाग जाऊ ,परन्तु उस उम्र में और समय की नजाकत को देखते हुए ऐसा करना मेरे लिए संभव नहीं था /

उछल -उछल कर परिचय देने के क्रम में मैं थक चूका था और अब मैं सचमुच का रोने लगा था /भीड़ में से शायद किसी को दया आई /उसने कहा - छोडो जाने दो बेचारे को हास्टल में ही तो रहेगा /अब वह छात्र जो मेरे सीनियर थे ,मेरे भगवान् बन चूके थे /उनका यह वचन मानो मेरे लिए समुद्र की लहरों में गोता खाने के क्रम में एक लाईफ जैकेट पहन लेने जैसा था /

मैं वापस कतरास गढ़ लौट रहा रहा था /मैं जिनके यहाँ ठहरा था उनका देर से आने का कारण पूछना लाज़मी था /
वे वानिया जाती के थे,वे व्यापार से जुड़े थे /रैंगिंग क्या होती है इसके बारे में न तो उन्होनें सुना होगा और न देखा होगा ..ऐसा ख्याल मेरे मन में आया /अतः मुझ पर क्या बीती ,ईसका दुखड़ा रोने से कोई फायदा नहीं होने वाला था /कबीर की चौपाई याद आ गई
"मन की दुखड़ा मन ही रखो गोय
सुन ईटलहिये लोग सब ,बाँट न लिहें कोय "
मैं चुप ही रहा / कल होने वाले घटना क्रम के बारे में सोच-सोच कर आंखों से नींद गायब थी /

2 टिप्‍पणियां:

  1. यह रैंगिंग भी खूब है!
    बसन्तपञ्चमी की शुभकामनाएँ!

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  2. बहुत खूब, लाजबाब रैंगिंग
    वसंत पंचमी की ढेरो शुभकामनाए

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