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गुरुवार, 3 फ़रवरी 2011

तकिया


तकिया ....
सिरहाने से लगी
माथे को सहारा देती
रुई से भरी
नर्म और मुलायम
छोटी सी वस्तु //
नींद नहीं आती
तकिये के बिना
जितनी अच्छी तकिया
उतनी स्वस्थ नींद //

आओ प्रिय !
तुम मुझे,अपनी बाहों का तकिया दो
मैं तुम्हे अपनी बाहों का
ताकि इस भागमभाग में
गुजार लें दो हसीन पल //

28 टिप्‍पणियां:

  1. bahut khub.
    ताकि इस भागमभाग में
    गुजार लें दो हसीन पल

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  2. कविता को बहुत ही अच्छी लिखी है आपने

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  3. बहुत ही सुन्दर रचना है भईया आपकी..
    बहुत शुभकामनायें आपको ..

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  4. अर्थ पूर्ण कविता ...साधुवाद पाण्डेय जी !

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  5. बबन जी.........बहुत खूब.........बाहों से बढ़िया तकिया .दुनिया में हो ही नहीं सकता.........

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  6. खटिया गर टूटी हो,छत गर चूती हो ,
    कम्बल गर फटा हो,पेट गर भूखा हो,
    वक़्त गर गर्दिश में हो,रात अंधियारी हो,
    गर तेरी बाँहों का तकिया मिल जाए,
    वह पल स्वर्ग से भी सुन्दर हो जाए.

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  7. bhai sahib ...........takiya gar bhaaon ka ho kya baat ...........sukhad ahsaas .........wah

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  8. प्रेम की बहुत ही सुन्दर परिभाषा .......

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  9. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  10. आपकी उम्दा प्रस्तुति कल शनिवार ०५.०२.२०११ को "चर्चा मंच" पर प्रस्तुत की गयी है।आप आये और आकर अपने विचारों से हमे अवगत कराये......"ॐ साई राम" at http://charchamanch.uchcharan.com/
    चर्चाकार:Er. सत्यम शिवम (शनिवासरीय चर्चा)

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  11. बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति। साथ ही एक बात बा अदब ये कहना चाहूंगा कि इसकी 'अन्तिम दो पंक्ति "ताकि इस भागमभाग में गुज़ार लें दो हसीन पल" मुझे एक्सट्रा लग रहे हैं" इन दो पंक्तियों के बिना कविता ज़ियादा प्रभावशाली होगी ऐसा मैं महसूस कर रहा हूं।

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  12. सही समय पर प्रेम की सुन्दर अभिव्यक्ति आपने प्रस्तुत की है!

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  13. बहुत ही खूबसूरती से अपनी बात कह डाली और किसी को खबर भी न हुई !

    बहुत सुन्दर अंदाज़ !

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  14. बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति।

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  15. वाह! इससे बढिया तकिया और क्या होगा।

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  16. अगर उनकी बाहों का तकिया मिल जाए तो उम्र यूँ ही गुज़र जाए ... बहुत खूबसूरत लम्हे ...

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  17. रचना कोमलांगी है, और सुंदर भी।

    अर्थात बहुत अच्छी।
    बस देखते ही रहो पढ़ते ही रहो।
    .

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  18. सुंदर रचना के लिए साधुवाद! मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है!

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  19. बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति....!।

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  20. वाह! इससे बढिया तकिया और क्या होगा।

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  21. कुछ दिनों से बाहर होने के कारण ब्लॉग पर नहीं आ सका
    ....माफ़ी चाहता हूँ

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  22. " बाहों का सिरहना "..बहुत ही उम्दा अन्दाज भाई साहब....

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