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रविवार, 14 नवंबर 2010

मन का दर्द

(यह मेरी पहली रचना है जो मैंने १९८० में लिखी थी ..कैसे हुई इस कविता का जन्म ...नीचे पढेगे ..यह पटना से प्रकाशित लघु पत्रिका "पहुँच " में छपी थी )

किसे सुनाऊ
इसे कब तक सहलाऊ
कोई क्या समझेगा
दूसरे के मन का दर्द
दर्द के कारण
हो गई है मेरी आंखें सर्द ॥

हर समय नहीं होता
यह दर्द
जब सोच का बैलून फटता है
तब उठता है
मन में दर्द ॥

अन्य दर्दो की दवाये भी हैं
पर इसकी कोई दवा नहीं
इसीलिए सोचता हूँ
चिंता छोड़ काम पर लग जाऊ
शायद इसी उपचार से ठीक हो जाए
मन का दर्द ॥

मैं बिहार के नालंदा जिला में अवस्थित जैनों के प्रसिद्द तीर्थ पावापुरी से चार किलोमीटर दूर एक निहायत ही मामूली विद्यलय से मेट्रिक किया ...पुरे स्कुल में सबसे अधिक अंक लाने के वावजूद मेरा नामांकन पटना साईस कालेज में नहीं हुआ ...मगर मेरे एक मित्र का ....जाति गत आरक्षण के आधार पर नामांकन हो गया । बालमन में टीस उठी ...और यह कविता अपने आप बन गई ।

9 टिप्‍पणियां:

  1. बबन जी आप अपने मन से इस दर्द को हमेशा के लिए निकाल दीजिये....... क्यूंकि जो होता है वो ऊपर वाले की मर्ज़ी से होता है ...........ऊपर वाला शायद आपको कुछ ज्यादा देना चाहता था, इसीलिए आपको उसने एक ज़ंजीर में बंधने नहीं दिया........ only he(God) knows, sometimes we DESERVE more than we DESIRE.So TRUST and ACCEPT his every action.

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  2. "मन का दर्द"...Bade Bhai Shree Baban Ji, aap ki ye kavita aap ki darad ko jarur vyakarti hai, lekin ye dard aaj pure Bharatiya samaj ko khokhali karti ja rahi haai. Jaisa ki aapne kaha bhi hai ki जाति गत आरक्षण के आधार पर नामांकन हो गया । Yah hamare desh ki vidambana hai. Jo Aajadi ke 63 varsho baad bhi ye hal hai.
    "मन का दर्द"...padh kar maan to dukhit hota hai, lekin kaduwi sachhayi hai, aap ki ye kavita.
    Bahut hi sundar varnan hai. Ati saral shabdo ka prayog kiya hai aapne. bahut hi sarahaniy kavita hai ye.

    Aap ko bahut-bahut Hardik Dhanyavaad.

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  3. yah dard kuch kuch universal sa hai...
    aaj bhi aarakshan ko lekar aisi samasyayen dikhti hi hain!!!
    sundar varnan... saral sundar kavita!!!!

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  4. विजयलक्ष्मी जी से सहमत हूँ……………वैसे टीस बखूबी उभर कर आयी है।

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  5. Baban bhai मन का दर्द बड़ा अज़ीब होता है, न सहा जाता है न कहा जाता है.

    तभी तो रहीम जी ने लिखा है-

    "रहिमन निज मन की व्यथा, मनहीं रखो गोय,
    सुनि अठिलैहैं लोग सब, बांटि न लेहैं कोय"

    बहुत अच्छी एवं भावपूर्ण रचना है भाई, शेयर करने के लिए शुक्रिया.

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  6. samay is dard ka sabse bada marham hai Baban bhai...aapka jo mitra kam ank lane ke bawzood nominate hua shayad vah sahitya ke aakash me itna oopar n gaya ho jitne ki aap ...aap to diljeetne wale ho aur achchhi tarah settled bhi ..aap apne us mitra ko badhayi zaroorbhejen ki uski wajah se aaj aap ham sab ke dilon me kaise raj kar rahe ho

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  7. बबन भाई, रावन /कंस का रास्ता तो आसान रास्ता है इसलिए दुनिया इसीपर चलती है ...आप लिखते है कि आप इस रास्ते पर फर्राटा भरते हैं..नहीं यह सही नहीं ...जो ऐसा करते करते हैं आप उनको लक्ष्य मान कर निशाना लगाते हैं..औ आपका यह तीर बिलकुल निशाने पर लगा है....
    (main hawai jahaj se safar karta hoon par ek comment)

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