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सोमवार, 15 नवंबर 2010

मैं हवाई जहाज उडाता हूँ

माँ की गोद में
सीखा तुतलाना
पिता की ऊँगली पकड़
सीखा चलाना
गुरूजी से सीखा
'क ' 'ख 'ग' और
भाईचारा /प्रेम /स्नेह /परोपकार की
साईकल चलना ॥

किशोर वय में सीखा
तितलियों के पीछे भागना
फिर सीखा
पीछे से धक्का देना
दूसरों को लंगड़ी मार
आगे निकल जाना ॥

अब .....
रावन /कंस /कौरव के
बनाए रास्ते पर फर्राटे भरता हूँ
और
बेईमानी /फरेब का
हवाई जहाज उड़ाता हूँ ॥

11 टिप्‍पणियां:

  1. बबन जी आजकल लोगों ने मेहनत करने के बजाय सब कामों का शॉर्टकट रास्ता निकाल लिया है . जाहिर सी बात है शॉर्टकट होगा, तो इमानदारी का तो हो नहीं सकता . एक बात और" बच्चे भगवान् का रूप होते हैं "., जैसे जैसे बड़े होते हैं उन्हें दुनिया का रंग चढ़ जाता है.

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  2. जैसे जैसे इंसान बड़ा होता है झूठ फरेब में पड़ता चला जाता है ...अच्छी अभिव्यक्ति

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  3. वाह! बेहतरीन व्यंग्य्…………कडवा सच्।

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  4. Baban ji bacche kacchi mitti ki manind hote hai, ham unhe jo aakaar de de vo usme dhal jaate hai, aur aajkal ke sandarvh me bilkul sahi kaha aapne her koi dusre ke kandho per pair rakhker aage niklane ki phiraak me laga hai.............

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  5. बबन जी शब्दों के जहाज़ भी आप खूब उड़ा रहे हैं ....और भ्रष्टाचार की खिल्ली इस तरह से उड़ते रहेंगे तो शायद एक दिन भ्रास्तचारी और भ्रष्टाचार इस देश से फुर्र हो जाएगा....

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  6. व्यंगात्मक प्रहार अति उत्तम है I ऐसे हवाई जहांजों का हवा में ही विस्फोट हो जाता है क्यों की कहीं न कहीं कृष्ण एव राम रूपी चक्र सुदर्शन व् धनुषवान क्रियाशील हो जता है I बस जितनी देर हवा में सांस लेलें I अत सुन्दर वयंग I हार्दिक बधाई I

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  7. बबन जी............सही कहा आपने.........और बचपन से युवा और फिर बड़े होने तक.किसी इंसान में कैसे बदलाव आते है....आज वो बेईमानी /फरेब का हवाई जहाज उड़ाता है.......पर बबन जी ..वो हम सबको देख रहा है बचपन से हवाई जहाज उड़ाते हुए.......इसलिए उसे बेशक अच्छी बात बोल कर सीखाई......पर वो सीख गया जो उसे बोल कर नहीं सीखाई पर देख कर सब सीख गया...उसके सारे दावं-पेंच.........इसलिए हमसे अच्छा उडाता है आज वो अपना जहाज.......

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