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शनिवार, 13 नवंबर 2010

अंधेर नगरी -चौपट राजा

मेरी अक्ल चरने गई है
कुछ समझ में नहीं आता
६२ वर्ष के
गालों पर झुर्रियों वाले
नकली दांतों वाले
और एक सुनहली लाठी के मित्र
मेरे रिटार्ड चाचा जी को
पुनः नौकरी क्यों लगी ॥

और जानते है
मजे की बात
उनका बेटा बेदम है
रोजगार अखबार पढ़ते -पढ़ते ॥


कैसी है ये नीति
कैसे है ये नेता
अंधेर नगरी , चौपट राजा
बजाते रहते
बिना सुर के बाजा॥

9 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही सुन्दर कटाक्ष है तत्कालीन नीतियों पड़...वह...

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  2. अच्छा कटाक्ष ....कई जगह यह भी देखने में आया है कि बाप- बेटा एक ही कंपनी में काम करते थे ....बेटा रिटायर हो गया और बाप की नौकरी के कई साल बाकी थे :):)

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  3. Wah Baban ji ek bahut hi behtareen kataksh aaj ki vyavastha ka chahre per se nakaab uthata, sachmuch aaj gadhe ghas kha rahe hai aur khode khade sharma rahe hai, apni dasha per....Andher nagri chaupat raaja, aur baja rahe hai milker bina sur ka baaja.......

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  4. अच्छा है आप कवि नहीं है ..//
    कवि होते तो जाने क्या - क्या गजब ढाते भाईसाब ..//
    १४ वर्ष की आयु मे 'पहुँच' मैं छपी ..//
    आपकी कविता कैसे पढ़ सकते है ..//
    आपके अनुज..//
    संजीव गौतम

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  5. Baban ji, Aaj ke sansaar ke sabse bade loktantra kahe jaane wale desh ki lachar neetiyon mein se ek maha lachar neeti yeh bhi hai! Wakai mein aapne ek karara vyangya diya hai aisi neetiyon par!

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  6. बबन जी, क्या कहा जाए , आज की परिस्थिति पर एक अच्छा व्यंग्य किया है आपने......पर सब अपनी अपनी किस्मत का खेल है.

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  7. ham aNdhoN me kana raja chunte rahenge, to chaupat raja, hamari sone ki nagri ko andher banaate hi raheNge.

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