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रविवार, 12 सितंबर 2010

मैं बूढ़ा नहीं होऊंगा

मैंने ....
अपने दोस्त से कहा
क्या बचपन लौट सकता है ?
क्यों नहीं ...
बचपन के दोस्तों से मिलिए
पुरानी बातों को याद कीजिये
दिल खोल कर हंसिये
आपका बचपन लौट जाएगा ॥


वैसा ही किया मैंने
लंगोटिया दोस्तों के पास गया
उन्हें गले लगाया
खूब बातें की
अपने प्यार की
शैतानी की
पतंग काटने की
और कागज से बने नाव के
बहते पानी में दौड़ लगाने की ॥

सच में ....
जब तक मेरे दोस्त
इस दुनियाँ में रहेगे
मैं बूढ़ा नहीं होऊंगा ॥

13 टिप्‍पणियां:

  1. सब मन का ही तो खेल है……………सुन्दर प्रस्तुति।

    आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति के प्रति मेरे भावों का समन्वय
    कल (13/9/2010) के चर्चा मंच पर देखियेगा
    और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा।
    http://charchamanch.blogspot.com

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  2. man kai hara har hai man kai jeeta jeet
    aadmi kabhi budha nahi hota ----
    koshis aachhi hai

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  3. एकदम सही फ़ार्मुला बताया।
    और पाण्डेय जी, ये वर्ड वैरिफ़िकेशन हटाईये, टिप्पणी करने में असुविधा होती है।

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  4. वाह बबन जी, बचपन को दुबारा देखने को मजबूर कर दिया आपकी कविता ने। काश ! वो दिन हमारी मुठ्ठियों मे बन्द रहते। पर वे दिन तो रेत की मानिन्द सरक गये।

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  5. GOPAL BHAI ...AUR MO SAM KAUN BHAI ...JIS PRAKAR JOHRI HI HEERE TO PAHCHANTA HAI ..USI PRAKAR AAP GUNI JAN HI RAH DIKHATE HAI .. BLOG PAR AANE KE LIYE THANKS...

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  6. मैं भटक रहा हूँ यहाँ वहां, उन गए दिनों की तलाश में
    कहाँ गम हुईं वो मुहब्बतें, वो मनाने वाले किधर गए

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  7. बब्बन भैया बहुत भावुक रचना है .. बधाई स्वीकार कीजिये जैसे कोई काल यन्त्र हो मुझे मेरे बचपन में ले जाने के लिए

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