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मंगलवार, 28 सितंबर 2010

जाल

हालांकि ....
मैं /आप /हमसब
रोज देखते है
मकड़े को
बुनता हुआ एक जाल
फिर फंसता हुआ उसी जाल में भी ॥

फिर भी ...
हम बाज नहीं आते
बुनते रहते है
घर में /मंदिर में /समाज में
स्वं को फंसाने वाला एक जाल
और अंततः हम फंस जाते है ॥

3 टिप्‍पणियां:

  1. badhiya tulnatmak arthon ko sahejti kavita...
    makdi ka jaal khud bun kar usme fansna chetanjagat ka prarabdh to nahi hi hona chahiye tha...
    sundar arth buna hai!
    subhkamnayen:

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  2. sundar vivachan ek ek insan ki prakriti ke bare men ...Baban bhai ....Nirmal Paneri

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