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शुक्रवार, 8 अक्तूबर 2010

अब डरता नहीं , डराता हूँ

बच्चा जब जन्म लेता है
माँ की छाती को रौंदता है
पिता के कंधों पर दहाड़ता है
सच माने ...वह किसी से नहीं डरता ॥

फिर बच्चा बड़ा हो जाता है
होश संभालता है
माँ से डरने लगता है
पिता से डरने लगता है
गुरु जी से डरने लगता है
धर्म से डरता है ॥


फिर एक दिन
वह परिपक्व हो जाता है
अब वह नहीं डरता
माँ से /पिता से /धर्म से
बल्कि वह
सबको डराने लगता है ॥

16 टिप्‍पणियां:

  1. " अब वह नहीं डरता ,बल्कि डराने लगा है "
    यथार्थवादी बड़ी ही सुन्दर रचना , बधाई

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  2. मेरे ख्याल से सब पारिवारिक परिवेश पर निर्भर करता है...
    अगर परिवार से अच्छी शिक्षा मिले तो शायद ये नौबत न आये..

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  3. पारिवारिक परिवेश पर निर्भर नहीं करता बल्कि आज ये एक अटल सत्य बन गया है ... कोई माता पिता अपने बेटे की परिवेश में कोई कमी नहीं होने देता .... हर माँ बाप ये चाहते है की मेरा बेटा एक अछा इन्सान बने ...

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  4. सच लिखा है आपने
    इसके बाद भी एक चरण और है बुढ़ापे का
    जब इन सभी बातों की एक बार फिर पुनरावृत्ति होती है.
    और हमें न चाहते हुए भी चुप-चाप सब सहने पर विवस
    होना पड़ता है.
    - विजय

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  5. किशलय भाई ...सही कहा आपने ...चुकी डर से सम्बंधित है ..इसीलिए बुढ़ापे का जिक्र नहीं किया

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  6. paripakwata ke saath ye kaisi visanati gher leti hai...
    sundar chitra kheencha hai dar se darane tak ke safar ka!

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  7. बबन जी...अच्छा चित्रण किया आपने आदमी के डर का .................यह जीवन कि अवस्था से भी जुदा प्रश्न है........बचपन........किशोर........युवा.......गृहस्थ ....बुढ़ापा...बचपन में उसे किसी चीज का कुछ पता नहीं होता......तो वो किसी से नहीं डरता.....किशोर के शुरू में में वो खुद अह्सहांय होता है तो उसे सबके सहारे कि जरूरत होती है........तो डरना शरू कर देता है...........पर किशोरावस्था के अंत तक उसकी अपनी सोच बननी शुरू हो जाती है.......और उसका डर जाने लगता है.........जो युवा अवस्था युवा शक्ति के जोश में अपने चरम पर होता है ..........बस उसे अपने पर भरोसा होता है.........इसलिए किसी से नहीं डरता ........लेकिन गृहस्थ होते ही..........जिम्मेदारियों का अहसास उसे सोचने को मजबूर कर देता है........उसे डरना है या नहीं.........बस शंशय में रहता है.........पर बुढ़ापा जब आता है और उसकी अपनी शक्ति जाती रहती है तो.....उसे भी डर लगना शुरू हो जाता हैं.......

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  8. शुक्रिया नरेश भाई ..और अनुपमा पाठक जी

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  9. Bahut hi achha chittran huaa hai, aapko bahut bahut badhai.

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  10. बहुत ही सटीक चित्रण किया है अपने॥

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  11. ज्ञानपूर्वक होशसे भरपूर व्यक्ती किसीसे नाही डरती है

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  12. bhavpoorna rachana .........shabda shabda dil me utar gaya ...........ek achchhi rachana ke liye dhanyavaad

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  13. आपका ब्लॉग पसंद आया....इस उम्मीद में की आगे भी ऐसे ही रचनाये पड़ने को मिलेंगी......आपको फॉलो कर रहा हूँ |

    कभी फुर्सत मिले तो नाचीज़ की दहलीज़ पर भी आयें-
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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