followers

मंगलवार, 26 अक्तूबर 2010

मैं भी जड़ बनूगा


थकती नहीं
पेड़ की जड़ें
पानी की खोज में
छू ही लेती है
भूमिगत जलस्तर ॥
मरने नहीं देती
अपनी जिजीविषा ॥


बखूबी जानती है वह
हर पत्ते को
हरियाली ही देना है
उसका काम ॥

अब .....
नहीं थकूगा
मैं भी जड़ बनूगा॥

21 टिप्‍पणियां:

  1. Babanji bahut khoob Jad ko ek bahut sunder paribhasha dene ke liye, ek sakartamak soch ko jamn deti...bahut sunder abhivyakti............

    उत्तर देंहटाएं
  2. बबन जी ......मुझे जब से आप मेरे फ्रेंड की लिस्ट में है ...तब से आब तक के सब से सुन्दर कृतियों में से ये एक लगी है ...बबन जी ..शै में आज सुबह हे सुबह अब .....
    नहीं थकूगा
    मैं भी जड़ बनूगा.............बहुत सुन्दर और बधाई आप को धर सारी!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

    उत्तर देंहटाएं
  3. बबनजी जड़ चाहे परिवार की हो या फिर पेड़ की ,मजबूत होने पर ही फलता फूलता है . जड़ परिवार के मुखिया की तरह है जिसे टिककर हर परिस्थिति का सामना करना पड़ता है. बहुत सुन्दर रचना.....

    उत्तर देंहटाएं
  4. विजय जी आपने एकदम सही पकड़ा ...जड़ से मेरा मतलब ...परिवार के मुख्य सदस्य से है .....जिस किसी भी परिस्थिति में काम करना होता है ..और पेड़ के लिए जड़ ही उसका मुखिया है

    उत्तर देंहटाएं
  5. बाप रे बाप!क्या बात कही है आपने भ्राता श्री! मसतिस्क के तार झन झना दिए! कभी ना भुलने बाली एक बहुत ही छोटी परन्तु अत्यन्त ही महत्वपुर्ण बात, गुरु की अमृत वाणी जैसा! अब ... नहीं थकूगा, मैं भी जड़ बनूगा!! बहुत ही सुन्दर भ्राता श्री.. बधाई हो!

    उत्तर देंहटाएं
  6. bahut sundar!
    being the root is a divine concept!
    well written on the fact!!!
    regards,

    उत्तर देंहटाएं
  7. dhanyawaad Babanji, aapki kavita aam aadmi ki soch hi hai......isiliye padhne mein achchi lagti hai.....

    उत्तर देंहटाएं
  8. Sabko Jad banne ki prerna deti hui rachna hai ....
    main bhi koshish karoongi Jad banne ki ......thanks Baban bhai ...


    Anu joshi

    उत्तर देंहटाएं
  9. kya likha hai apne wah wah wah karna hi parega.the poem is motivating us 2 do ur work with divotion.

    उत्तर देंहटाएं
  10. बबनजी,
    आपको बेशकीमती रचना लिखने के लिये ढेर सारी बधाइयां...
    आपकी रचना एवं उसपर विजयलक्ष्मीजी का मंतव्य "जड़ चाहे परिवार की हो या फिर पेड़ की, मजबूत होने पर ही फलता फूलता है. जड़ परिवार के मुखिया की तरह है जिसे टिक कर हर परिस्थिति का सामना करना पड़ता है" बिल्कुल एक दुसरे के लिये सटीक लिखे गए हैं...

    उत्तर देंहटाएं
  11. खुदा ना करे मेरी मोहब्बत,
    आप की कामयाबी की राह में आये,
    बस जहां भी देखें तुम्हें दुनियां में,
    चारों तरफ़ आप ही आप नज़र आंयें

    उत्तर देंहटाएं
  12. बहुत बढिया बबन जी.............जहा आज के परिवेश में लोग इसका का महत्त्व भूलते जा रहे है .........कोई किसी को अपनी जड़ नहीं बनाना चाहता........वही अब कोई किसी कि जड़ बनने में भी खुशी नहीं महसूस करता..क्योकि सब अपने में ही मस्त रहना पसंद करने लगे हैं...........उस वक्त में आपकी यह रचना उन लोगो को झंझोड़ने के लिए काफी हैं.......

    उत्तर देंहटाएं
  13. बबनभाई.. बधाई हो.
    बहुत ही प्रतीकात्मक रचना के लिए.. दायित्त्व निर्वहन का बेजोड़ वर्णन..

    उत्तर देंहटाएं
  14. जड़ को उदात मूल्य बनाकर स्थापित करना अद्भुत .....जड़ की ऐसी व्यंजना विरल है .....काव्यास्वाद आज ब्रह्मानंद -सहोदर बन गया ..... प्रिय मित्र बबन जी ,मेरी बधाई और शुभ कामनाये स्वीकार करे ...!!!!!!

    उत्तर देंहटाएं
  15. आपकी कविता लेखनी सदाबहार है ,सुन्दर है-शाश्वत है परन्तु महत्वपूर्ण है नए-नए सार्थक विषयों को चयनित करने की आपकी जिजीविषा और उसी क्रम में "मैं भी जड़ बनूँगा"अद्भुत आयाम है.आपने "जड़"को जीवनदायिनी,पुष्पित-पल्लवित,समर्थ-सक्रिय सिद्ध कर नवपर्भाषित किया और जड़ बनने की कामना,साधुवाद!साधू,साधु!!

    उत्तर देंहटाएं
  16. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं
  17. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं
  18. मरने नहीं देती
    अपनी जिजीविषा ..........बहुत ही सुन्दर रचना.....

    उत्तर देंहटाएं

मेरे बारे में