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गुरुवार, 21 अक्तूबर 2010

मैं भी ना ....

धुम्रपान ....
स्वास्थ्य के लिए हानिकारक कैसे
समझाता हूँ बच्चो को विस्तार से
भय दिखता हूँ
कैंसर का
फिर कुछ ही देर बाद
मैं स्वम धुम्रपान करता हूँ
बच्चो के सामने ही ॥

बच्चो के बैग से
नैतिक शिक्षा की किताब
निकालता हूँ /शौक से
प्रेम /भाईचारा /प्यार /देशभक्ति का
पढ़ाता हूँ पाठ
फिर तुरंत बाद
नाले की समस्या को लेकर
पड़ोसियों से करता हूँ
गाली -गलौज ॥

मैं भी ना ......
भाषण देना/ जितना आसान
निभाना /उतना ही मुश्किल ॥

11 टिप्‍पणियां:

  1. Babanji, very true.........sikhana sabko aata hai, sahi kya -galat kya sab jaante hain........lekin amal mein laana namumkin nahin parantu bahut mushkil hai.......sikhane ki keemat tabhi hai jab aapka aachaar-vyavhaar aapki seekh ki tarah ho.

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  2. बिलकुल सही कहा है आपने! हम दुसरों को तो राह दिखाने की कोशिश करते हैं पर खुद ही भटक जाते हैं! ये ठीक उसी तरह है जैसे चिराग तले अंधेरा !

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  3. जी! मेरे फेसबुक के वाल और दिल के वाल में भी बहूत फर्क है सायद उल्टा भी हो।

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  4. बबन जी, मैं क्या हर व्यक्ति आपके विचार से सहमत होगा.
    ये अगर बीमारी है, तो कोई भी अछूता नहीं है. एक बात और मै इसे बुरा भी नहीं समझता. आखिर हम जो नहीं कर पाते (अच्छे कार्य) उसकी अपने बच्चों से अपेक्षा तो की ही जा सकती है. अगर हम खुद बुरा करें तो नैतिकता के नाते अपने बच्चों को बुरा करने की सलाह तो नहीं दे सकते. हाँ खुद में सुधार लाने का प्रयास सराहनीय होगा.
    "जो हम दूसरों को सिखाते हैं, यदि खुद उसपर अमल करें तो ये दुनिया स्वर्ग बन जाएगी."
    बहुत बहुत धन्यवाद् ऐसी रचनाओं के लिए.
    जय हो !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

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  5. badhiya likha hai hamari pravritiyon par...
    kathni aur karni ke beech sachmuch bahut badi khaayi hai...

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  6. बबनजी मेरे भाई
    यह तो व्यक्तित्व का दोहरापन है ...काश हर व्यक्ति की करनी और कथनी एक होती तो यह धरती स्वर्ग बन जाती . या यह कहें कि भगवान हमें अभी स्वर्गवासी नहीं बनाना चाहता है इसलिए करनी और कथनी का अंतर इंसानी दिमाग के कम्प्यूटर में फिट क...र रखा है..उसकी मर्ज़ी वह जाने ...बहुत ही सुन्दर और प्रभावी सन्देश देती इस कविता के लिए आभार व् साधुवाद

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  7. बबनजी,
    आपका यह सत्य तो ऐतिहासिक है... राजस्थान में तो एक बहुत पुरानी कहावत चरितार्थ है "आप गुरूजी बैगन खाव, औरां न परहेज बताव"... यानी कि महात्माजी ने प्रवचन में बैगन ना खाने कि सलाह दी और फिर भोजन में जमके बैगन खाए... हा हा हा हा

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  8. बबनजी,
    आपका यह सत्य तो ऐतिहासिक है... राजस्थान में तो एक बहुत पुरानी कहावत चरितार्थ है "आप गुरूजी बैगन खाव, औरां न परहेज बताव"... यानी कि महात्माजी ने प्रवचन में बैगन ना खाने कि सलाह दी और फिर भोजन में जमके बैगन खाए... हा हा हा हा

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  9. जिस दिन मेरे बेटे ने पैन मुंह में लेकर हवा में झूठे छल्ले बनाये, और मेरे समझाने पर कि बेटा स्मोकिंग अच्छी चीज नहीं होती, आगे से ये जवाब दिया कि पापा आप क्यों सिगरेट पीते हो फ़िर? छूट गई तब से हमारी तो आदत।
    पोस्ट एकदम सही लिखी है आपने, पर उपदेश कुशल बहुतेरे।

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  10. Vartam samaj me aisa hi ho raha hai...ham kahate kuch aur hai...aur karate khuch aur...pariwar me Ma-Bap hi bachcho ka pratham guru hota hai... ya ye kahiye ki pratham padashala Pariwar hi hota hai ...agar wahi galat kare to bachcho ko kya nasihat dega...bahut hi achha lika hai ...aapne ....kash ham kuch sikh le pate aap ki is rachana se...Dhanyavaad.

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