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गुरुवार, 14 अक्तूबर 2010

मुझे लेमनचूस नहीं ,चाकलेट चाहिए

बड़े -बुजुर्ग कहते है ...
पहले का ज़माना और था
देखा -देखी नहीं था
लोगों को थोड़े में संतोष था
बच्चे /जवान /बूढ़े सभी
लेमनचूस में मान जाते थे ॥

मगर ...
आज हर कोई
कुछ भी करने को है तैयार
उसे लेमनचूस नहीं
उसके सर पर चढ़ा है
चाकलेट खाने का बुखार ॥

32 टिप्‍पणियां:

  1. बबनजी,
    बिल्कुल सच्चाई है, कहीं कोई अतिशयोक्ति नहीं...

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  2. बहुत सुन्दर परिवर्तन का विवरण,बधाई,
    दरअसल परिभाषा मात्र बदली है "थोड़े से की "
    पहले यह"लेमनचूस"थी अब"चोकलेट"हो गई है.
    नहीं? है यह "थोडा सा ही"

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  3. मधु भाई @...मेरे विचारो को गति देने के लिए शुक्रिया

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  4. विनोद भाई @...मन का भी परिवर्तन हुआ है भाई ...पढ़ते रहिये ...लिखते रहिये

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  5. रौआ ठीके कहतानी भैया जी, बाकि उ लेमचुस से मुँहमा लाल, पीयर, हरिहर हो जात रहलँ, लेकिन ई चौकलेटवा से त मुँहमा करिया हो जाता जी !

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  6. परिवर्तन ही जिंदगी है...कोई भी पल एक सा नहीं होता है यहाँ....हर पल हर दिन हर समय...नया होता रहता है......उसी के आधार पर जिंदगी की ज़रूरतें भी बदल रही है...

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  7. बब्बन जी
    यह बात हमारे बड़े -बुजुर्ग कहते है, सही भी है, लेकिन अगर हम उनसे यह पूछे की हमें चाकलेट की आदत किसने डाली, तो सायद उनके पास भी जबाब न हो,,उसी तरह जैसे शेर को जब एक बार आदमी का गोश मिलता है फिर वो किसी और का शिकारकरना पसंद नहीं करता ..........?

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  8. to get thing by hook or by crook is the principle of today! change has been vital!
    nice poem!

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  9. बबन जी बहुत बढिया रचना आपकी.......बबन जी ...यह परिवर्तन और उन्नति और इंसान की भौतिक चीजों के प्रति बढती हवस की प्रतीक हैं..... इसलिए जहा पहले थोड़े में संतोष मिल जाता था वही अब.........किसी चीज कि कोई सीमा नहीं हैं.इसलिए संतोष अब सिर्फ छन भर के लिए ही मिलता हैं.उसके बाद फिर अगली चीज को पाने कि दौड शुरू हो जाती हैं.........

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  10. Aaj jamaana Kactus, Kukurmutte, Kutte aur Kameene aur Lafange, idiots, Don, Bhai,ityaadi ka hi to hai. Kahana hai rashtrabhakton, krantikaariyon, Mohan chando Sharma jaison,ko koun poochhta hai. Unki to shahadat tak per prashna chinha lagaatey hue sharm bhi nahin aati.

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  11. हमारे प्यारे राष्ट्र कवी हरिवंश राइ बच्चन के सुपुत्र अमिताभ बच्चन कहरहे है कुछ मीठा होजये चोकोलेट के रूप में तो इस विदेशी सभ्यता का चलन बढेगा ही न /

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  12. चाकलेट खाने का बुखार , और बर्बादी की दूकान

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  13. Babanji, kuch paane ki chah galat nahin hai, ye to insaan ki pravarti hai......galat hai usko paane ka galat tarika "en ken prakaren".Agar raah sahi ho to chaahna boora nahin hai.

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  14. यही तो फर्क है उस जमाने मे और अब के जमाने मे - परिवर्तन संसार का नियम है

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  15. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  16. ha ha ha !!bahut badiya babban ji.. aajkal nibhu paani se nahi chalta hai kam..
    unhe to chahiye coca cola, miranda ya phir papsi ke jaam...
    bachcho ko behla dete thy hum goliyon se..
    par ab wo hee hame bahlane lage hain choclate, burger aur pizza se..
    toh zamana badal raha hai..babban ji ..badalne mai hee bhalai hai.....Jai ho...

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  17. kya ham sab v iss bhautiktavadi samaj ka ek hissa matra ban kar nahi rah gaye hain?Paschimikaran ka nakal karte karte ham sab v uss aapa-dhapi me shaamil ho gaye hai.

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  18. vinita ji@ very true....hamlog paschim ki nakal kar rahe hai ...agree with u

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  19. लेमनचूस में मान जाते थे ॥ - if one has not tried i they must - jo maja lemanchoos me hai wo chocolate me kahan?

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  20. very true Babbanji.....time is changing .....slate nahi laptop chahiye.......

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  21. बहुत बढ़िया बहुत बढ़िया !!!!

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  22. भोगवाद और भौतिकवाद पर कटाक्ष करती एक अति सुन्दर रचना !

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  23. प्रभावशाली ,
    जारी रहें।

    शुभकामना !!!

    आर्यावर्त
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