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गुरुवार, 22 जुलाई 2010

तैरता मन अब डूबने लगा है ....

अब सर से पानी निकलने लगा है
तैरता मन भी अब डूबने लगा है ॥

सूनी माँ की आंखों में , बेटे का इंतज़ार है
अब ,सिर्फ उनका ताबूत घर आने लगा है ॥

आशा लगाईं थी कुदाल ने , लाल कोठी पर
कपास के खेतों में भी अब दरार आने लगा है ॥

अब खाव्बो की मलिका , मरने लगी है
इच्छाओ का घर भी अब ,जलने लगा है ॥


मैं कुछ कर न सका दोस्तों, देश के लिए
इसका मलाल अब मुझे , आने लगा है॥

लाल कोठी-संसद

4 टिप्‍पणियां:

  1. आज की राजनीति, तथा उसका समाज और सामान्य लोगों के संबंध को बहुत हीं कम पंक्तियों में व्यक्त क्राने के लिए साधुवाद !

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  2. मैं कुछ कर न सका दोस्तों, देश के लिए
    इसका मलाल अब मुझे ,खलने लगा है॥
    (खलने लगा है ज्यादा प्रभावित करता है )

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