
शायद तुम्हें याद हो
दौड़ चली थी तुम
चांदनी रेत पर
मानो पैर नहीं
एक जोड़ा पंख हो ॥
उड़ने लगी थी तुम
उस ऊर्जा के बल पर
जो मैंने तुम्हें दी थी
अपनी हथेलियो से
तुम्हारी हथेलियों में
जो मेहँदी के रंग से जवान था ॥
गुजर गई थी सारी रात
कापते लवों को रोकने में
पहली बार
थरथराया था मेरा शरीर
पहली बार पढ़ा था मैंने
किसी के आंखों की भाषा
और शायद
हमदोनो ने बो दिया था
प्यार का पहला बीज ॥


