(यह मेरी पहली रचना है जो मैंने १९८० में लिखी थी ..कैसे हुई इस कविता का जन्म ...नीचे पढेगे ..यह पटना से प्रकाशित लघु पत्रिका "पहुँच " में छपी थी )
किसे सुनाऊ
इसे कब तक सहलाऊ
कोई क्या समझेगा
दूसरे के मन का दर्द
दर्द के कारण
हो गई है मेरी आंखें सर्द ॥
हर समय नहीं होता
यह दर्द
जब सोच का बैलून फटता है
तब उठता है
मन में दर्द ॥
अन्य दर्दो की दवाये भी हैं
पर इसकी कोई दवा नहीं
इसीलिए सोचता हूँ
चिंता छोड़ काम पर लग जाऊ
शायद इसी उपचार से ठीक हो जाए
मन का दर्द ॥
मैं बिहार के नालंदा जिला में अवस्थित जैनों के प्रसिद्द तीर्थ पावापुरी से चार किलोमीटर दूर एक निहायत ही मामूली विद्यलय से मेट्रिक किया ...पुरे स्कुल में सबसे अधिक अंक लाने के वावजूद मेरा नामांकन पटना साईस कालेज में नहीं हुआ ...मगर मेरे एक मित्र का ....जाति गत आरक्षण के आधार पर नामांकन हो गया । बालमन में टीस उठी ...और यह कविता अपने आप बन गई ।
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रविवार, 14 नवंबर 2010
शनिवार, 13 नवंबर 2010
अंधेर नगरी -चौपट राजा
मेरी अक्ल चरने गई है
कुछ समझ में नहीं आता
६२ वर्ष के
गालों पर झुर्रियों वाले
नकली दांतों वाले
और एक सुनहली लाठी के मित्र
मेरे रिटायरर्ड चाचा जी को
पुनः नौकरी क्यों लगी ॥
और जानते है
मजे की बात
उनका बेटा बेदम है
रोजगार अखबार पढ़ते -पढ़ते ॥
कैसी है ये नीति
कैसे है ये नेता
अंधेर नगरी , चौपट राजा
बजाते रहते
बिना सुर के बाजा॥
कुछ समझ में नहीं आता
६२ वर्ष के
गालों पर झुर्रियों वाले
नकली दांतों वाले
और एक सुनहली लाठी के मित्र
मेरे रिटायरर्ड चाचा जी को
पुनः नौकरी क्यों लगी ॥
और जानते है
मजे की बात
उनका बेटा बेदम है
रोजगार अखबार पढ़ते -पढ़ते ॥
कैसी है ये नीति
कैसे है ये नेता
अंधेर नगरी , चौपट राजा
बजाते रहते
बिना सुर के बाजा॥
अगर सजनी हो दिलदार
शुक्रवार, 12 नवंबर 2010
एक दिन मैं भी बिक जाऊँगा
आजिज हूँ
बच्चों के डिमांड के आगे
सबको चाहिए
कुछ न कुछ
शहर जाते ही
हवा लग जाती है उन्हें ॥
पत्नी के ताने
अलग से
क्या करते है आप
सब कहाँ से कहाँ निकल गए
ज़माने से कदम मिलाईये
अपने लिए भी
बँगला -गाडी खरीदिये ॥
आखिर... मन को
कब तक दबाउंगा
एक दिन मैं भी बिक जाऊँगा ॥
बच्चों के डिमांड के आगे
सबको चाहिए
कुछ न कुछ
शहर जाते ही
हवा लग जाती है उन्हें ॥
पत्नी के ताने
अलग से
क्या करते है आप
सब कहाँ से कहाँ निकल गए
ज़माने से कदम मिलाईये
अपने लिए भी
बँगला -गाडी खरीदिये ॥
आखिर... मन को
कब तक दबाउंगा
एक दिन मैं भी बिक जाऊँगा ॥
राजनीति
राजनीती ...
एक गन्दा खेल !!!
इसकी हर चाल में
नेता बनते
हमेशा
राजा और मंत्री ॥
और ....
जनता
हमेशा बनती है
उनका
हाथी /घोडा और सिपाही॥
क्या जनता
हमेशा बनती रहेगी
उनकी कठपुतली ॥
एक गन्दा खेल !!!
इसकी हर चाल में
नेता बनते
हमेशा
राजा और मंत्री ॥
और ....
जनता
हमेशा बनती है
उनका
हाथी /घोडा और सिपाही॥
क्या जनता
हमेशा बनती रहेगी
उनकी कठपुतली ॥
गुरुवार, 11 नवंबर 2010
विटामिन की गोलियाँ
आज नहीं रुक रही थी
फाईल पर उनकी कलम
नहीं खोज रही थी
उनकी आंखें
सेल्फ पर रखे
सरकारी नियमो की किताब
पैर में मानों
लग गए हों पहिये ॥
मैंने भी खाई है
विटामिन की गोलियाँ
मगर उसमे नहीं होती
नोटों की गद्दियों जैसी ऊर्जा ॥
फाईल पर उनकी कलम
नहीं खोज रही थी
उनकी आंखें
सेल्फ पर रखे
सरकारी नियमो की किताब
पैर में मानों
लग गए हों पहिये ॥
मैंने भी खाई है
विटामिन की गोलियाँ
मगर उसमे नहीं होती
नोटों की गद्दियों जैसी ऊर्जा ॥
बुधवार, 10 नवंबर 2010
हे ..ईश्वर
हे इश्वर
तू जला मन की दीपक
भर दे तू मुझ में
परोपकार का तेल
और दे दे
धैर्य का
एक दिया सलाई .
जब कभी बुझाने लगे
यह दीपक ...
तो फिर से जला सकू ...
थोड़ी सी लज्जा दे
थोडा सा मृदुलभाषी बना
पहना दे मुझे
विन्रमता का गहना
हे ..ईश्वर
मेरे दिल को अपना नीड़ बना ॥
तू जला मन की दीपक
भर दे तू मुझ में
परोपकार का तेल
और दे दे
धैर्य का
एक दिया सलाई .
जब कभी बुझाने लगे
यह दीपक ...
तो फिर से जला सकू ...
थोड़ी सी लज्जा दे
थोडा सा मृदुलभाषी बना
पहना दे मुझे
विन्रमता का गहना
हे ..ईश्वर
मेरे दिल को अपना नीड़ बना ॥
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