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रविवार, 5 दिसंबर 2010

गुजारिश


नज़र से नज़र को मिलायो इस कदर
कि किसी की नज़र ना लगे
मेरे खयालों में आओ इस कदर
कि किसी को खबर ना लगे //

ए खुदा ! सब पर रहम कर इस कदर
कि कोई इंसान बीमार ना लगे
दोस्त ! खुदा से कुछ भी मांगो इस कदर
कि उसे भी ज़हर ना लगे //

मौन की भाषा


मौन होते है आंसू
मौन होती है आँखे
मौन होती है
दीपक की लौ
मौन होती है
फूलों की खुशबू
मौन होती है
इन्द्रधनुष
मौन होती है कलम
और उसके शब्द
मगर क्रांति लाते है //

आईये ....
हम भी सीखे
मौन की विचित्र भाषा //

शनिवार, 4 दिसंबर 2010

प्रेम की चिड़िया


मेरे पास थी एक चिड़िया
उछलती थी
कूदती थी
फांदती थी
उड़ते रहती थी
कभी माँ के आँचल में
कभी पिताजी के कंधे पर
कभी भाभी की साडी से
जाती थी लिपट
कभी दोस्तों के यहाँ
कभी पड़ोसियों के यहाँ
कभी चुग लेती थी
खेतों से मटर और चना //

काम /काम /काम
काम से फुर्सत नहीं था मुझे
मैंने उसे खाना नहीं दिया
ना ही पानी
उसके पंख टूट गए
वह मर गई //

जानते है
वह चिड़िया कौन थी
वह थी ....
मेरे दिल में रहनेवाली
प्रेम की चिड़िया //

शुक्रवार, 3 दिसंबर 2010

गर्माहट

एपार्टमेंट की छत पर
मिली थी थोड़ी सी जगह
गुनगुनी धूप सकने को
तरंगित होने लगी यादे //

अब तो सपनों जैसा ही है
पिताजी की गोद में बैठकर
अलाव सेकना //

मैं नहीं दे पाया
अपने बच्चो को वैसा प्यार
जैसा मैंने पाया अपने पिता से
इन गगनचुम्बी ईमारतों में रहकर //

हम खोते जा रहे है
रिश्तों में गर्माहट देने की कला
जो हमारी विरासत थी //

हम एक आदमी को आदमी कब कहेंगे

बचपन में .....
मुर्गा बनाते थे गुरु जी
कुछ बड़ा हुआ
फिर कहने लगे
तुम गदहे हो
उल्लू के पट्ठे हो //
खेलता -कूदता -उछलता
तो माँ कहती
तुम बन्दर हो क्या //

मेरे ऑफिस में एक कर्मचारी है
बिलकुल सीधा -साधा
लोग उसे गाय कहते है
एक दूसरा कर्मचारी
बिना लिए कुछ करता नहीं
लोग उसे कुत्ता कहते है //
किसी के पक्ष में न बोलो
तो वह कहता है
तुम आदमी हो या पैजामा //

भगवान् सिंह ने कर दी हत्या
हत्यारा कहलाने लगे
अपने ही साथी से बलात्कार कर बैठा
लोग उसे अब बलात्कारी कहते है
अब आगे नहीं लिखूंगा
अब लिखने को बचा भी क्या //

एक प्रश्न का उत्तर चाहिए
मेरे दोस्त ...
हम एक आदमी को आदमी कब कहेंगे ?

बुधवार, 1 दिसंबर 2010

स्वेटर

जब मैं बच्चा था
पिताजी लाते थे
उन के धागे //
माँ के हाथों बनी
स्वेटर में
होती थी गर्मी //

...नहीं मिलती वह गर्मी
मिल में बने स्वेटर में //
माँ ....
मैं फिर से निकाल लिया हूँ
तुम्हारे हाथो का बुना स्वेटर //

घोसला

ओ !... नभचरों
सारा आकाश है तुम्हारा
मगर ....
तुमने बनाया मात्र
एक घोसला
अपने रहने के लिए //

मैं पेशोपेश में पड़ गया हूँ
क्यों दिग्भ्रमित करते हो मुझे
मुझे संतोष नहीं एक घोसले से
आदमी हूँ एक
पर ,घोसला चाहिए अनेक //

मेरे बारे में