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शनिवार, 21 अगस्त 2010

बासुरी का मन बदलने लगा है ...


धुप ने मन बनाया था , आपको झुलसाने का
हवा ने मन बनाया था ,आपको फुसलाने का
तूफ़ान ने मन बनाया था , आप को दहलाने का
काले बादलों ने मन बनाया था , आपकी काजल चुराने का
फूलों ने मन बनाया था , आपकी खुशबू छीन लेने का
कमल ने मन बनाया था ,आपकी कोमलता हर लेने का
मोतियों ने मन बनाया था , दांतों की चमक क्षीण करने का
और बासुरी ने मन बनाया था , आपकी सुर -सप्तम चुरा लेने का
मगर ......
मैंने आपको अपना कर
सबके नापाक मंसूबों पर
पानी फेर दिया ॥

8 टिप्‍पणियां:

  1. Wah Baban ji bahut hi sunder arth purn rachna.............badhai.....

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  2. HAMESHA KI TARAH SUNDAR WA ARTH PURN PRASTUTI
    BABAN BHAI ............

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  3. बबन जी आपकी कविता बहुत ही सुंदर है, एक ही अर्थ समझ आया, वो यह, कि प्यार यदि सच्चा हो तो सब कुछ अकेला झेल सकता है.

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  4. बबनजी, इतनी कोमलता के साथ आप ह्रदय के सभी तारों को छेड़ गए कि जब होश आया तो देखा सारा आलम प्यार के रंगों से भरा पड़ा है. बहुत सुंदर कविता है. लिखते रहिये, शुभकामनाएं.

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  5. बबन जी ......आपने सही कहा ,,,प्यार वो नहीं होता जो मुसीबत में साथ दे .. प्यार वो होता हे जो साथ हो तो कोई मुसीबत ही नहीं आये

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