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शुक्रवार, 13 अगस्त 2010

देख लेता हू आपको खबावो में

छन-छन कर आती है धूप, जैसे सुराखों से
देख लेता हू आपको कभी भी , अपने खवाबों से ॥

रोग भागती नहीं , खा -खा कर नकली दवाओं से
उम्मीद डूब जाती है ,बिना लक्ष्य के पतवारों से ॥

काले घनेरे बादल देख कर डर जाता हू
खवाबो को ही आगोश में कर लेता हू ॥

आज के बाद से , अंधेरों का मुहं दूंगा सिल
लगे रहे काम में ,तो मिल ही जाएगा मंजिल ॥

2 टिप्‍पणियां:

  1. छन-छन कर आती है धूप, जैसे सुराखों से
    देख लेता हू आपको कभी भी , अपने खवाबों से ॥
    बहुत अच्छी रचना, बबन जी

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  2. काले घनेरे बादल देख कर डर जाता हू
    खवाबो को ही आगोश में कर लेता हू ॥
    waah pandey ji मिल ही जायेगी मंज़िल

    बहुत सुन्दर रचना

    उत्तर देंहटाएं

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