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शनिवार, 8 अक्तूबर 2011

नज्म


झुकना नहीं सीखा था ,इसलिए टूट गया हूँ
लूटना नहीं सीखा था, इसलिए लुट गया हूँ //

अविश्वास की डोर से,मैं रिश्ते नहीं बाँध पाया
अपनों ने छोड़ा मुझे,मैं परायों को भी नहीं छोड़ पाया //

सबका खून एक है,मगर क्यों कोई ईमान बेच देता है
अपने चूल्हे की आग बुझा ,दुसरे पर रोटी सेक लेता है //



स्वस्थ बीज अगर बोयेगा किसान ,फल ज़रूर निकल जाएगा
इत्मीनान से बैठकर सोचो बबन ,कोई हल ज़रूर निकल जाएगा //

14 टिप्‍पणियां:

  1. ji ha sir ek na ek din hal jaroor niklega...bahut achchhi kriti hai

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  2. बहुत सुंदर रचना है बब्बन जी

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  3. आपकी नज्म बहुत अच्छी लगी.क्या तारीफ़ करू कुछ कहते नही बनता..

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  4. झुकना नहीं सीखा था ,इसलिए टूट गया हूँ
    लूटना नहीं सीखा था, इसलिए लुट गया हूँ //
    bhut acha.

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  5. Hello! My first visit, will visit you again. Seriously, I thoroughly enjoyed your posts. Congrats for your work. If you wish to follow back that would be great I'm at http://nelsonsouzza.blogspot.com
    Thanks for sharing!

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  6. bahut hi umda sabdon ki najuk kaliyo ko bhavnao me khilaya hai sir ji

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  7. झुकना नहीं सीखा था ,इसलिए टूट गया हूँ
    लूटना नहीं सीखा था, इसलिए लुट गया हूँ /

    Kya khoo likha hai aapne

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  8. प्रिय बबन भाई,
    आपकी लेखन शैली विशिष्ट है। नये और पुराने को एक साथ मिलाने की कला अद्भुत है!

    राधे राधे।

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  9. प्रिय बबन भाई,
    आपकी लेखन शैली विशिष्ट है। नये और पुराने को एक साथ मिलाने की कला अद्भुत है!

    राधे राधे।

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  10. Nice poetry....sirji
    http://kunaltimesquare.blogspot.in/

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