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बुधवार, 1 दिसंबर 2010

स्वेटर

जब मैं बच्चा था
पिताजी लाते थे
उन के धागे //
माँ के हाथों बनी
स्वेटर में
होती थी गर्मी //

...नहीं मिलती वह गर्मी
मिल में बने स्वेटर में //
माँ ....
मैं फिर से निकाल लिया हूँ
तुम्हारे हाथो का बुना स्वेटर //

18 टिप्‍पणियां:

  1. पुरानी यादें ताज़ा हो गई बबन भाई .....
    याद है मुझे जाड़े के दिन शुरू होते ही ....माँ पड़ोस की चाची ,बुआ,सब धूप में बैठ कर स्वेटर बुना करती थी .......एक एक फंदों को जोड़ कर स्वेटर बुनना ...कितना अपनापन होता था उनमे और गर्माहट भी .एक प्यार का एहसासभी ..अब सारी चीजे रेडीमेड हो गई है और शायद इंसानी सोच भी ...
    सीधी सरल भाषा में सुन्दर अभिव्यक्ति भाई ........धन्यवाद्

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  2. बहुत भावपूर्ण रचना आपकी बबन जी............पर गए वो जमाने..अब शायद ही दुबारा लौटे...अब तो नयी पीढ़ी को न बनाना आता है न ही कोई पहनना चाहता है......इसीलिए अब रिश्तों में वो गर्माहट भी नहीं होती.......

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  3. माँ के बनाये स्वेटर की बात ही और होती है ...!

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  4. Bahut hi bhavpurna kavita hai Baban ji .....us samay ki baat hi aur thi ...tabhi to maa ke haath se bane sweter aaj bhi sabko yaad hain ....

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  5. माँ के बुने हुए स्वेटर! वाह ! सुनते ही जाड़े की ठंडक दूर हो गई. इसे कहते है, सर्दी में गर्मी का एहसास!! बहुत सुन्दर भाव. धन्यवाद.

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  6. sahi time pe aur dil ko chune wali ....purani yaad taja karne wali ye kavita bahoot sundar...

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  7. bahut khoob babanjee... abhi apne shahar patna se bahut door hoon par wahan rah rahe maa ki yaad aa gayiii barbas hi....
    kabhi aakarshangiri.blogspot.com par bhi aaiye...

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  8. बहुत सुन्दर रचना है बबन जी, बड़ी भाव विभोर कारक रचना है ! गर्मी रिश्तों की होती है न कि केवल स्वेटर या अन्य कपड़ों की ही होती है !

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  9. सीधी सरल भाषा में सुन्दर अभिव्यक्ति भाई ........धन्यवाद्पुरानी यादें ताज़ा हो गई बबन भाई .....Dhananajay Mishra

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  10. wah garmi bhawnaaon kee thi, ek ek dhaage mein duayen thin ... isse badhker aur kuch nahin ...

    vatvriksh ke liye aap apni rachnayen ---


    मैं आदमी हूँ
    ईश्वर उवाच
    सत्य कब्र से भी निकलकर दौड़ता है
    bhejiye rasprabha@gmail.com per parichay, tasweer aur blog link ke saath

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  11. माँ को किसी शब्द जाल मे बांध पाना संभव नहिं है ! माँ, माँ होति हैं उन जैसी कोई नहिं !

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  12. माँ...............तेरी सूरत से अलग भगवान की सूरत क्या होगी

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  13. माँ के द्वारा बुने हुए स्वेटरमें उनके प्रेम और स्नेह्की गर्मी जो होती है ,

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  14. मां ..सचमुच पुरानी याद को आपने हरा कर दिया..

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  15. ममता के स्पर्श की गर्माहट ,एक सुखद अहसास और स्नेह-उर्जा का संचय लिए ऊन के बुने वे स्वेटर आज आपने तो निकाल लिए पर पर आने वाली पीढियां जरुर इस से महरूम हो जायेंगी ....आजकल की मोडर्न मम्मियों के पास समय कहाँ है ....

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