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मंगलवार, 21 दिसंबर 2010

२१ वी सदी का फलसफा


ऐसा जीना भी क्या
जीना यारों ....
जब न दे समाज को धोखा
और जिसमे न उठा हो
विवाद का चोखा //



ऐसा पीना भी क्या
पीना यारों
जब न दे यार को गाली
जिसमे न पोरोसी गई हो
शराब -शबाब की थाली //

20 टिप्‍पणियां:

  1. ????? यहाँ तो कुछ भी नहीं है...

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  2. सही है आज के आम जिन्दगी मे आदमी इसके बिना बेकुफ कहलाता है!

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  3. बबन जी! बहुत खूब! आज के इंसान की मानसिकता को प्रतिबिंबित करती फलसफा जिसका निष्कर्ष सिर्फ 'फल' कहो कैसे भी फिर कैसे भी 'साफ' बने रहने की जद्दोजहद करते रहो....

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  4. ह दुनिया उसी की, जमाना उसी का.................
    धोखा है जिसको ,भाता है चोखा................
    शराब और शबाब की है मस्ती चढ़ी जिसे
    दिन रात विवादों में है जो उलझा
    २१ वी सदी का मानव है कहलाता ...........
    ...बहुत बढ़िया बबनजी, आज की परिस्थिति में बिलकुल सही लिखा.............

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  5. पतन के फलसफे ऐसे ही तो होते हैं....
    सटीक रचना!

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  6. कब डूबते हुए सुरज को देखा था, याद है?

    कब जाना था शाम का गुज़रना क्या है?


    तो दोस्तों शहर की इस दौड़ में दौड़् के करना क्या है

    जब् यही जीना है तो फ़िर मरना क्या है?

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  7. शेखर जी //
    आप लगातार मेरी कविता नज़र रखते है शुक्रिया

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  8. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (23/12/2010) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।
    http://charchamanch.uchcharan.com

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  9. आज के जमाने के इंसान का बेहतरीन चित्रण। धन्यवाद।

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  10. ऐसा पीना भी क्या
    पीना यारों
    जब न दे यार को गाली
    जिसमे न पोरोसी गई हो
    शराब -शबाब की थाली //
    Bahut sahi hai

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  11. सच का सामना हो गया,क्यों क्या हुआ ?
    हिम्मत हो तो इसे गलत कर के दिखाओ I

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  12. वाह बबनजी । जीना और पीना तो कोई आपसे सीखे ।

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  13. shukriya..
    kumpsingh ji /
    SMdubey ji /
    DINESH MAURYA JI //
    HAUSLA BANAAYE RAKHE /

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  14. सुख क़े परिकाष्ठा को प्राप्त करती हुई एक सामायिक सुंदर रचना.....!

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  15. भई वाह ! आज का चित्रण इतने कम शब्दों में ।

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  16. सही व्यंग. भाई साहिब ..........ऐसी भी क्या जिंदगी जिसमे धोखे ,विवादों ,या भ्रष्ट व्यवहार का टग न लगा हो .........या यूँ कहे कि ढाबे की दाल में करार तडका न लगा हो ..........बेरंग सी लगेगी ऐसी जिंदगी........

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