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रविवार, 19 दिसंबर 2010

भेड़ चाल


माहिर होते है
भेड़ और गधे
एक लीक एक चलने में //

सुना है ---
अगर एक भेड़ कुए में गिरा
सब भेड़ उसी में गिरेंगे //

आज ----
कंक्रीट के जंगल में
रहनेवाला मानव
इसी भेडचाल की नक़ल तो कर रहा //

16 टिप्‍पणियां:

  1. सर जी बिल्कुल सही |
    यह २१ वीं सदी का मानव है ..................

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  2. एक दम सही लिखा है , बबन जी आपने . बधाई

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  3. आपने बिलकुल ठीक लिखा है बबन भैया !
    लोकतंत्र को भिडतंत्र बनने से रोकना होगा. इसमें गुणवत्ता लानी होगी.

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  4. क्या नया है जो एक बुद्धिजीवी जानता नहीं
    भीड़ का हिस्सा बना, आत्मा की मानता नहीं
    क्यों हर कोई
    बस देखा देखी है भेड़ चाल चल रहा
    अधिकारों की है बात करता
    कर्तव्यों से है कर छल रहा

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  5. बढ़िया विचार हैं आपके बब्बन जी,
    आज का आदमी सचमुच भेड़चाल की नक़ल कर रहा,
    अपने को बड़ा,दूसरों से जुदा सिद्ध करने,कौतुक कर रहा.

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  6. भेड़ की नक़ल तो है पर भेड़ चाल कहाँ ..सब अपनी अपनी चाल चल रहे हैं

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  7. सही कहा, आपने, संगीता जी ने भी।

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  8. बहुत सुन्दर और आज के कंक्रीट संस्कृति को जाहिर करती रचना|
    वास्तव में हम इस अपार्टमेंट और कंक्रीट के जंगल में फंस कर ठीक उसी भेडो की तरह हि कुँए में गिरने वाले हैं |

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  9. इसी भेड़ चाल में इंसान ने धरती को कोंक्रीट का जंगल बना दिया है.
    उत्तम भाव की रचना........

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  10. Aaj ka maanav bhed chal mein hi to phans kar rah gaya hai, apna parichay, sanskriti aur apna atmvishwaas khota ja raha hai! Concrete ke jungle mein apna astitva bhi kahin ganwa na de!
    Bheed ka hissa na ban e maanav
    apne hriday aur aatma ki bhi maan,
    Aaj ka maanav bhed chal mein hi to phans kar rah gaya hai, apna parichay, sanskriti aur apna atmvishwaas khota ja raha hai! Concrete ke jungle mein apna astitva bhi kahin ganwa na de!
    Bheed ka hissa na ban e maanav
    apne hriday aur aatma ki bhi maan,
    Kyon ki isi bheed mein kahin kho na jayen
    apni sanyata aur sanskriti ke nishaan!Kyon ki isi bheed mein kahin kho na jayen
    apni sanyata aur sanskriti ke nishaan!Aaj ka maanav bhed chal mein hi to phans kar rah gaya hai, apna parichay, sanskriti aur apna atmvishwaas khota ja raha hai! Concrete ke jungle mein apna astitva bhi kahin ganwa na de!
    Bheed ka hissa na ban e maanav
    apne hriday aur aatma ki bhi sun

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  11. वन्दे मातरम...बबन जी..
    बेहद सटीक चित्रण किया आपने शहर में रहने वाले समाज का ...

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  12. बबन जी, भेड़ चाल का ही ज़माना है....................इससे भला तो किसी का होना नहीं है .............ऐसा लगता है मानो सारे कुँए में ही भांग मिला दी है, और सब पिए जा रहे हैं.....................बस जिसने खुद को बचा लिए , समझो वो आगे निकल गया .

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  13. बढ़िया विचार...सही लिखा आपने !

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  14. आदरणीय बबन सर, कांक्रीट के जंगलों में गुलाब की खेती की मरीचिका में फँसे भ्रमित मानव की दुर्दशा पर आपका कटाक्ष सही चोट करता है..उम्मीद करनी चाहिए इस अन्धानुकरण को त्याग कर मनुष्य भेड़-गधा चाल का परित्याग कर स्वयं की मतवाली, जो किसी ने कभी न देखी हो ऐसी निराली चाल चले, ऐसे विलक्षण पग बडाये कि जिसपर आनेवाली पीड़ियाँ नाज़ करें ...आपके स्नेह की प्रतीक्षा में

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  15. ओह जबर्दस्त..

    दूर से मारा है..

    मेरा ब्लौग..

    http://chouthaakhambha.blogspot.com/

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