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रविवार, 26 दिसंबर 2010

किताबें


किताबें
हंसाती है
रुलाती है
गुदगुदाती है//

किताबें
फतबा है
पावंदी है
पुरस्कार है
जेल है //

किताबे
ललकारती है
फुफकारती है
सनसनाती है
आईना दिखाती है //

किताबें
बोझ है नई पीढ़ी पर
ई -किताबे पढ़ते है वे //

13 टिप्‍पणियां:

  1. किताबें
    बोझ है नई पीढ़ी पर
    ई -किताबे पढ़ते है वे /

    सही है की आज की पीढ़ी इ-किताबें पढते हैं ,पर किताबें कभी भी अपना महत्व नहीं खो सकतीं. अपने चाहनेवालों के लिए वह प्रेमिका हैं जिनका साथ वे कभी नहीं छोड़ सकते. किताबें उनको चाहने वालों के लिए जिंदगी हैं. सुन्दर प्रस्तुति.

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  2. kitna sahi likhe hain aap.wakayee nayee pidhi kitab hi nahin padhti hai.

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  3. सही है पर किताबें कभी भी अपना महत्व नहीं खो सकतीं हैं|

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  4. कम से कम पढते तो हैं ..नहीं तो आज कल किताबों को पढने का चलन कम ही हो गया है ...अच्छी प्रस्तुति

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  5. अच्छी रचना है. लेकिन किताबें कभी जेल नही हो सकती हैं.

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  6. सब से अच्छा दोस्त है किताबें

    न कुछ मांगती है

    ना कुछ शिकायत करती हैं

    अपने चाहने वालो को हमेशा देती है

    मुंह फेर लो रूठती नहीं

    पास चले जायो तो दुत्कारती नहीं

    अज्ञानी का उपहास नहीं उड़ाती

    बस हर दम अपने सब कुछ न्योछावर करने को उद्यत

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  7. किताबें
    बोझ है नई पीढ़ी पर
    ई -किताबे पढ़ते है वे //
    xxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxx
    बिलकुल सटीक ..शुक्रिया

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  8. किताबे ललकारती है, फुफकारती है, सनसनाती है, आईना दिखाती है
    वाह बहुत सही कहा आपने भाई साहब !

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  9. आपका कार्य प्रशंसनीय है, साधुवाद !

    हमारे ब्लॉग पर आजकल दिया जा रहा है
    बिन पेंदी का लोटा सम्मान ....आईयेगा जरूर
    पता है -
    http://mangalaayatan.blogspot.com/2010/12/blog-post_26.html

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  10. पीटर ड्रकर एक साल में एक विषय पर विशेषज्ञता के लिये पुस्तकें पढ़ते थे। हम लोग साल में एक पुस्तक भी मन से पढ़ें तो अंतत पढ़ने की आदत बन जाये! :)

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