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शनिवार, 18 दिसंबर 2010

गीत -४ महक उठेगा खटिया


छुई -मुई सी है देह तुम्हारी
और फिसलता उर
नारी के यौवन को देख
फिसले मानव ,सुर -असुर //

लहरों में भी तेरा चेहरा
इन्द्रधनुष सा चमके
रातों में भी तेरा चेहरा
जैसे असख्य दामिनी दमके //

मन के आँगन में आओ
सींचो प्रेम की बगिया
आगोश में जब हम -तुम होंगे
महक उठेगा खटिया //

7 टिप्‍पणियां:

  1. हम्म। महक उठेगा खटिया!!
    उम्दा भाव।

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  2. ओह बहुत खूब लिखा है सर जी...
    मन के आँगन में आओ
    सींचो प्रेम की बगिया
    आगोश में जब हम -तुम होंगे
    महक उठेगा खटिया //
    वाह.....

    पहचान कौन चित्र पहेली :- ८ ..

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  3. इक चाँद आसमा में एक चाँद मेरे आगोश में
    वो चाँद बेनूर सा ये चाँद होशो हवाश में
    उसे देखू या इसे देखू क्या करू मेरे रब्बा
    वो छिप गया बादल में ये घूघट में ओट में

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  4. भाई साहब बड़ी सुन्दर,चमकदार,महकदार है "खटिया"
    "खटिया" सलामत रहे ,बा-क़यामत रहे,------"आमीन"
    "सरकाई लो खटिया जाड़ा लगे"साथ तुम्हारा प्यारा लगे.

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  5. आपका लेखन स्तर इससे ज्यादा अच्छा होता है ...

    इन भावों को शब्द चयन से खूबसूरती दी जा सकती थी ...

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  6. कविता में भाव पक्छ अच्छा है ,लेकिन इस कविता की मासूमियत को
    "खटिया" शब्द ने छिन्न-भिन्न कर डाला है। चाहें तो खटिया शब्द को बदल सकते हैं।

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