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शुक्रवार, 3 दिसंबर 2010

गर्माहट

एपार्टमेंट की छत पर
मिली थी थोड़ी सी जगह
गुनगुनी धूप सकने को
तरंगित होने लगी यादे //

अब तो सपनों जैसा ही है
पिताजी की गोद में बैठकर
अलाव सेकना //

मैं नहीं दे पाया
अपने बच्चो को वैसा प्यार
जैसा मैंने पाया अपने पिता से
इन गगनचुम्बी ईमारतों में रहकर //

हम खोते जा रहे है
रिश्तों में गर्माहट देने की कला
जो हमारी विरासत थी //

9 टिप्‍पणियां:

  1. हम खोते जा रहे है
    रिश्तों में गर्माहट देने की कला
    जो हमारी विरासत थी |

    yahi to hamara vikas hai sanvedansheel rachna

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  2. हम खोते जा रहे है
    रिश्तों में गर्माहट देने की कला
    जो हमारी विरासत थी //

    महानगरीय सभ्यता कितना दूर कर देती हैं हमें अपनी विरासत से..बहुत सुन्दर प्रस्तुति.

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  3. अतिसुंदर बब्बन जी,सचमुच "अब तो सपनो जैसा ही है पिता जी
    की गोद में बैठ कर अलाव सेकना"अत्यंत भावपूर्ण सत्य है .
    ""आज मैं ढूँढू कहाँ,खो गए जाने किधर,
    प्यारे-प्यारे पल वो हाए,प्यारे पल छिन.

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  4. बहुत पसन्द आया
    हमें भी पढवाने के लिये हार्दिक धन्यवाद
    कभी 'आदत.. मुस्कुराने की' पर भी पधारें !!

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  5. बबन जी.........बहुत सही बात कही आपने.......
    /हम खोते जा रहे है
    रिश्तों में गर्माहट देने की कला
    जो हमारी विरासत थी /.

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  6. bahut khub, darasal hum apne riste se jyda dusareke riste me kuchh jyada hi interest rakhne lage hai,kya aisha nahi lagta hain???

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  7. अब तो सपनों जैसा ही है
    पिताजी की गोद में बैठकर
    अलाव सेकना .....

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  8. Babanji, bahut sundar rachna hai............bachpan ki yaad taaza ho gayee........bus khushkismati kahiye ki hum bhi apne bachchon ke saath, jab jab mauka lagta hai, wahi quality time spend karte hain.

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