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गुरुवार, 9 दिसंबर 2010

मेरे घर में आपका स्वागत है


....................(१)...................
आइये ना ! मेरे घर
मेरे घर में आपका स्वागत है
आइये ना ....
मेरे ड्राइंग रूम में
सोफे पे बैठिये ना
पूरे नौ इंच धस जायेगे आप
सरकारी मुलाजिम हूँ ना
कल ही किसी ने दिया है
कोई देने लगा गिफ्ट में
जाने -अनजाने
कुछ ....
जायज़ -नाजायज़ करा ही लिया होगा //

---------------(२)......................

अरे....
क्या खोज रही है
आपकी आँखे दीवालों पर

गणेश जी और हनुमान जी का कैलेण्डर
अरे भाई साहब !!
कितने पुराने खयालात के है आप
कबकी हटा डाली उन्हें
मकबूल फ़िदा हुसैन की
लगाईं है पेंटिंग
बेचारे हुसैन साहब को
क़तर जाना पडा
अपना देश छोड़कर
हिन्दू देवी -देवताओं की
नंगी पेंटिंग जो बना डाली थी उन्होनें
खैर .....
मुझे तो अच्छा लगा
उनकी अधनंगी औरतों की पेंटिंग
मेरे घर की दीवालों पर
ऐसी ही पेंटिंग मिलेगी //
( लम्बी कविता है ...शेष भाग कल )
--------(३)-----------
फूलों का गुलदस्ता
खोज रहे है आप ....
मैंने उन्हें हटा कर रखा है
ऐश ट्रे ....
अपने दोस्तों के सिगरेटो की राख
जमा करने के लिए //
फुल तो बाहर
गमले में ....
शायद कई दिनों से मैंने
उन पौधों में पानी भी नहीं दिया //

-------(४)।-----------
आइये न
मेरे बच्चो से मिलिए
आपके चरण न छुए
तो उनकी तरफ से मैं ही
माफ़ी मांगता हूँ //
मैंने ही
उन्हें ऐसा करने नहीं सिखाया
गुड मॉर्निंग करेंगे आपको
आपको भी अच्छा लगेगा
जाति का ब्रह्मिन हूँ
बच्चों का उपनयन संस्कार भी किया था
अच्चा खर्चा भी हुआ
मगर ....
बच्चो ने कहा
it does not suits on my personality
और उतार कर फेंक दिया //
रामायण / महाभारत /कुरान
की कहानियां नहीं सुनना चाहते


(अधूरा )

13 टिप्‍पणियां:

  1. पेंटिंग दिखाने के लिए घर बुला रहे हैं क्या ?

    अच्छा व्यंग

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  2. बबन जी बहुत ही सुंदर कटाक्ष, पर अधूरी है, तो उत्सुकता बनी हुई है पूरी रचना पड़ने की, समय के साथ साथ बहुत कुछ बदला है, इस बदलते परिवेश मे रिश्तो के साथ सोच और मान्यताए भी बदली है हमारी, उन्ही पर प्रहार करती एक सुंदर रचना................

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  3. Bahut achchha vyangya hai ..... agle bhag ki pratiksha hai ...
    waise jin par vyangya kiya jaata hai - un par koi asar nahin hota kisi baat ka ......

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  4. बेचारा "मासूम" सरकारी मुलाजिम है ..............उसे तो पता भी नहीं उसने क्या किया. जो उसे तोहफे में सोफा मिली .किसी सीधे साधे व्यक्ति पर ऊँगली उठाना ......ना ना अच्छी बात नहीं ,........हा हा हा हा ,,,,,,अच्छा व्यंग्य !!!!

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  5. आखिर आपको भी लेने पर मजबुर कर ही दिया लोगों ने ! हाँ घुस हो तो एक बार मना भी कर दें, ईस मुए गिफ़्त के लिए कैसे मना करें?
    और फिर ये अपने ड्राइंग रूम की शोभा भी तो बढ़ाएगी !

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  6. bahut khub,,,a very candeed take on corruption...let us accept the truth...corruption is a reality of our society...

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  7. ये तेरा घर ये मेरा घर, ये घर बहुत हसीन है - बहुत खूब बबन जी

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  8. अच्छा व्यंग्य
    लिखते रहिए। अच्छा लगा जान कर की आप भी बिहार से है।

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  9. बबन जी, ये पहले शुरू हुआ था नजराना के रूप में ,वो भी पहले लोग लेने से न नुकुर करते थे , मगर ये आज कल फैसन हो गया है ,कौन कितना ज्यादा अपना दाम बाजार में बड़ा सकता है , क्योंकि इस बीमारी से पूरा समाज ग्रसित है|जैसा काम वैसा दाम ,यही निति चल रही है, सिर्फ सरकारी मुलाजिम ही इसके लिए दोसी नहीं जो लोग उनसे गलत कम करवाते/पैसा देते हैं वे भी तो इसके लिए कम जिम्मेवार नहीं हैं ,सिर्फ सरकारी मुलाजिम को क्यों कोसें ,और आगे का भाग आने के बाद .........

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  10. बबन भाई!! बढ़िया व्यंग ...सही कटाक्ष समाज में पल रे रिश्वतखोरी पर ......सही कहा आपने आजकल कोई भगवान की तस्वीर नहीं लगाता..wo उसे पिछड़ापन समझते हैं.
    ..सुन्दर कविता ..
    आभार .

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  11. बबनजी पहले तो साधुवाद कि शासकीय सेवा में होंने के बावजूद समाज के नासूर पर व्यंग..अब आज के अर्धनारीश्वर [Maqbool)की सुंदर कृति को उपयुक्त स्थानदेने के लिये..जब अर्ध..नारी है तो बिचारे भगवान का क्या काम..अति सुंदर भाई..

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  12. आदरणीय बबन जी
    नमस्कार !
    ......घर बहुत हसीन है
    "माफ़ी"--बहुत दिनों से आपकी पोस्ट न पढ पाने के लिए ...

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