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बुधवार, 9 जून 2010

आदमी एक दो मुहां साँप है


आदमी....
कभी बाघ बन दहाड़ता है
कभी कुत्ता बन लड़ता है
कभी गिद्ध बन मांस ग्रहण करता है
तो कभी
गीदर बन भाग खड़ा होता है
कभी गिरगिट की तरह रंग बदलता है

आदमी.....
कभी धर्म के लिए स्वं मरता है
कभी दूसरों को मारता है / काटता है
कही मंदिर बनाता है
तो कही मस्जिद गिराता है

आदमी ......
कभी देश बाटता है
कभी जाती बाटता है
कभी भाषा बाटता है
तो कभी एकता का पाठ पढ़ाता है

आदमी ....
कभी कंजूस बन पैसे के लिए मरता है
कभी दानी बन पैसे लुटाता है
कभी स्नेह करता है
तो कभी नफरत की आग बरसाता है

आदमी ....
कभी नारी को पूजता है
कभी नारी को जलाता है
कभी अपने बच्चे की बलि देता है
तो कभी बीबीयो को बदलता है

आदमी .....
कभी चोर बनता है
कभी साधू बनता है
कभी देशभक्ति की चादर ओढ़ता है
तो कभी देशद्रोह की तलवार भांजता है

मैं
आदमी हो कर भी
आदमी को नहीं समझ सका ....

सच कहू ... दोस्त
आदमी एक दो मुहां साँप है

3 टिप्‍पणियां:

  1. Bilkul sahi .... is aadmi ko koi bhi nahin samajh sakta ... ek do-muha saanp .....

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  2. मैं एक
    आम आदमी हूँ
    अज़र-अमर
    और शाश्वत

    इसीलिए मुझे
    मिटाने वाले मिट गए
    और मैं आज भी
    जिए जा रहा हूँ
    संकटों में भी
    मुसकुरा रहा हूँ ।

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  3. aadmi ke andar aadmiyat ya insaniyat aa jaye to ye sab apne aap dur ho jaye.

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