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शुक्रवार, 25 जून 2010

अब गोरैया कहां जायेगी

(महानगरों की आवास समस्या पर ...)
पहले
घर के आँगन में भी
बना लेती थी
गोरैया अपना घोसला ॥

भूलकर/भटककर
पहुँच गयी एक गोरैया
महानगर में ॥

पेड़ नहीं थे वहां
कहां बनाती अपना घोसला ॥

बिजली का खम्भा ही
एकमात्र विकल्प था
तिनका -तिनका जोड़ कर
बनाया अपना घोसला ॥

फिर एक दिन
बिजली कर्मियों ने
नष्ट कर दिया उसका घोसला ....
अंडे फूट गए ॥
अब गोरैया कहां जायेगी ??
------------बबन पाण्डेय

1 टिप्पणी:

  1. बबन जी,
    आपने एक अच्छे विषय पर ध्यान दिलाया है.
    जिस तरह हम अपनी सुविधा के लिए निरंतर प्रकृति प्रदत्त संसाधनों का अनावश्यक दोहन कर रहें हैं, यह आदत एक दिन हमें इस पृथ्वी पर अकेला जीवित प्राणी बनाकर छोरेगी.
    और वो पृथ्वी होगी, कुरूप तथा असुंदर. गोरैया और अन्य सुंदर मनमोहक जीवों से विहीन. ऐसी सश्य श्यामला धरा को हम ज्यादा न छेड़ें इसी में भलाई है.

    ऐसी काव्य रचना के लिए साधुवाद.

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