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शुक्रवार, 11 जून 2010

सुविधाभोगी

(प्रस्तुत कविता हिंदी के विद्वान कवि प० राम दरश मिश्र द्वारा सम्पादित पत्रिका ' नवान्न ' के द्वितीय अंक में प्रकाशित है, मेरी इस कविता को उन्होनें गंभीर कविता का रूप दिया था )

न तो ---
मेरे पास
तुम्हारे पास
उसके पास
एक बोरसी है
न उपले है
न मिटटी का तेल
और न दियासलाई
ताकि आग लगाकर हुक्का भर सकें ॥
और न कोई हुक्का भरने की कोशिश में है ।

सब इंतज़ार में है
कोई आएगा ?
और हुक्का भर कर देगा ।
आज !
हर कोई
पीना चाह रहा है
जला जलाया हुक्का ॥

-------बबन पाण्डेय

16 टिप्‍पणियां:

  1. बिल्कुल सही कहा बबन जी... आज के मशीनी युग में इन्सान बहुत ही ज्यादा आलसी हो गया है। उसका बस चले तो खाना भी अपने हाथ से न खाए..

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  2. प० राम दरश मिश्र ने कुछ गलत नहीं कहा है पाण्डेय जी, ये कविता सचमुच बहुत गंभीर कविता है.
    साथ साथ आधुनिक अति सुविधाभोगी समाज को आइना दिखने वाली.
    बहुत बहुत साधुवाद
    जय हो !!!!!!!!!!!!

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  3. सच मे भाई साहब आज कोई भी अपने हाथों कुछ भी करना नही चाहता! हर कोई चाहता है कि उसका हर एक काम अपने आप हो जाय या कोई कर दे बस , उसे अपना हाथ पैर हिलाना ना पडे़ ! शायद ये मशीनीकरण के कारण हुआ है ! "सुविधाभोगी" का इससे बड़ा उदाहरन और क्या होगा कि आज इन्सान खाना खाने के लिए भी चम्मच का सहारा लेता है ! कविता बहुत ही सुन्दर बन पड़ी है! शिर्शक "सुविधाभोगी" बेमिसाल है !

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  4. सच मे हर एक "सुविधाभोगी" है. कोई भी काम करना नही चाहता, बस हर काम अपने आप हो जाय.
    बिल्कुल सही कहा,
    बहुत सुन्दर, आज के इन्सान की सही परिभाषा "सुविधाभोगी" बेमिसाल है.

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  5. Babanji, mehnat kash logon se aaj bhi duniya bhari hui hai.........parantu suvidha bhogi log mehnat karne walon ki mehnat par paani pher dete hain. Burai jyada prominent ho kar saamne aati hai, chahe ant mein jeet achchai ki hi hoti hai.

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  6. एक आदमी नाई की दुकान पर पहुँचा और नाई की कुर्सी में धँस गया।

    उसने नाई से कहा- शेव कर दो।'

    नाई बोला- 'लेकिन साहब, अगर आपको शेव करवानी है तो सिर जरा ऊँचा करना पड़ेगा।'

    आदमी बोला- 'फिर, तुम बाल ही काट दो।'

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  7. बबन जी ............जब हम दे रहे हैं जला जलाया हुक्का तो कोई क्यों नहीं पीएगा..........जब हमारी बारी थी तब हमने पीया था.............वो हुक्का जो हमारी पिछली पीढ़ी ने सुलगाया था .....अब अगली पीढ़ी केलिए ऐसी बात क्यों.........सबको सुधारना हैं.........हम सब जिम्मेदार हैं.........बहुत सटीक लिखा हैं आपने............बहुत खूब....

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  8. प्रिय श्री पाण्डेय जी सत सत नमन. !!!۞!!!
    बहुत बढ़िया लिखा आपने...सहृदय धन्यवाद

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  9. yah kavita hame padahne ka vasar diya usake liye aap ka aabhar ,behtreen rachana hai

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  10. बबनजी,
    जले जलाये हुक्के की तो बात पीछे... अभी तो खाना भी वो चाहिये जो "फ़ास्ट फ़ूड" हो यानी कि बना बनाया तैयार तो होवे ही, जिसे खाया भी फ़टाफ़ट जा सके...

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  11. अति सुंदर बबन जी.........सच्चाई है....जितने साधन बढ़ते जा रहे हैं इंसान उतना ही अधिक आलसी होता जा रहा है....."आज के समय में तो हर कोई काम करवाना चाहता है करना नहीं"..........!

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  12. सत्य वचन बबन सर, वर्तमान समय में हमारी दिनचर्या में, हमारे हर व्यवहार में, जिस मानवीय शिथिलता का समावेश हो गया है
    उसके परिणामस्वरुप अपने पूर्वजों की तुलना में हम शारीरिक रूप से अस्वस्थ और कमज़ोर होते जा रहें हैं...
    आपने एक अच्छे विषय की ओर हम सब का ध्यान आकर्षित किया है..शुभकामनाओं सहित..आपका सुभेक्षक

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  13. bhai sahab jab aankho ke samne koi sapna ho to aadni suvidha bhogi nahi hota. kai kashto ko sahkar bhi kartavya path par data rahta hai. waise kavita bahut hi satik aur marmabhedi hai.
    shukriya.........

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  14. satya likha hai!
    suvidhabhogi jansamuday kahaan shram ke mahatva ko samajhta hai...

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