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रविवार, 6 जून 2010

पगडंडियों के फूल

(यह कविता उन लड़के -लडकियों को समर्पित है जो अंदर से कुभावना पाले है कि मैं सुंदर नहीं और मेरा चाहने वाला कोई नहीं । आशा है ,,यह कविता उन्हें एक नई उर्जा देगीं )

कमल का फूल नहीं हू मैं
ना ही गुलाब का फूल .....

मैं हू ...
सड़क की पगडंडियों के किनारे
उगने वाला फूल ..
"भवरे पंग्तिबद्ध है
उनका आलिंगन करने"
यह देख कर मैं
बराबर चिंतित रहता ॥

फिर एक दिन
एक अनजानी सी तितली
मेरे पास आयी ।
बोली ....तुमने भी
वही धूप
वही हवा
वही ऑक्सीजन
वही बरसा का पानी
पिया है ॥
तुम में भी
वही क्लोरोफिल और स्टार्च है ॥

रही बात भवरे की
तो सुनो
वे भवरे उनका आलिंगन करने नहीं
बल्कि निचोड़ने आये है ॥

यह बोल कर
उस अनजानी तितली ने
मेरा आलिंगन कर लिया ॥

6 टिप्‍पणियां:

  1. वही क्लोरोफिल और स्टार्च है ॥
    vakai 21 sadi ka poem hain bahut acchha laga

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  3. बबन जी, बहुत सुन्दर रचना है , किसी भी कमजोर व्यक्ति को हिम्मत देने की लाजवाब कोशिस की है आपने फूलों,भवरों और तितली के माध्यम से !!!!

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  4. Baban ji apni sharirik sunderta ko leker kunthit hone walo ko ek sunder sandesh deti ek khoobsurat rachna, vaise bhi sunderta to mun se hoti hai tan ki sunderta to shhanik hai.............

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  5. बबन जी बहुत सुन्दर अंदाज..........समझाने का..........रंग-रूप तो इश्वर कि देन हैं.....किसी को कैसा दे दिया किसी को कैसा.....इसमें किसी का अपना कोई बस नहीं........इसलिए इस पर किसी को भी मायूस होने की जरूरत नहीं..............उसी भगवान ने कुछ और प्रतिभा दी होगी .........जिसे लोग पसंद करेंगे....बस कोशिश यही हो की अपनी उस प्रतिभा को .पहचानो .......समझो और तराशो...........

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