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गुरुवार, 24 जून 2010

मैं तुम्हे पढना चाहता हु ...


तुम्हारी बातें
एक -एक शब्द जैसे ॥

श्वासों का आना -जाना
किताब के पन्ने
पलटने जैसा ॥

तुम्हारी मुस्कराहट
कविता पढने जैसी ॥

तुम्हारी हँसी
ग़ज़ल की पंग्तिया ॥

तुम्हारी उम्र का
हर गुजरा वक़्त
एक अध्याय समाप्त होने जैसा ॥

तुम्हें समझना
एक समझ न आने वाली
रहस्यमई कहानी जैसा ॥

सचमुच, तुम्हें पढना
एक किताब पढने जैसा ॥

हे ! प्रिय !!!
मैं पढ़ूंगा तुम्हें जीवन -पर्यंत
क्योकि ....
तुम्हें पढ़ना अच्चा लगता है ॥

7 टिप्‍पणियां:

  1. कल 14/02/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  2. प्रेम को पढते-पढते जीवन बीत जाये...इससे खूबसूरत जिंदगी और क्या होगी...उम्दा....

    उत्तर देंहटाएं
  3. हे ! प्रिय !!!
    मैं पढ़ूंगा तुम्हें जीवन -पर्यंत
    क्योकि ....
    तुम्हें पढ़ना अच्चा लगता है ॥

    प्रेम की अनूठी अभिव्यक्ति, बहुत सराहनीय!

    उत्तर देंहटाएं

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